भगवान ही मेरे रोल मॉडल है : रागिनी मख्खर

दिव्या

शहर की मशहूर कथक डॉसर एवं इंडियन गोड टेलेंट की विनर रागिनी मख्खर ने अपने कैरियर एवं अपनी पसर्नल लाईफ के कई पहलुओं पर खुलकर बातें की उन्होंने बताया कि उन्होंने ढ़ाई साल की उम्र में कथक सीखना शुरु किया एवं उनकी माँ ने उन्हें कथक के लिए प्रोत्साहित कर आगे बढ़ाया। अपने इस हुनर को वे गॉड गिफ्ट मानती है। उन्होंने बताया कि आईजीटी जीतना उनका मकसद नहीं था लेकिन भगवान ने अपोच्युनिटी दी और लोगों का प्यार जो मिला उसने उन्हें यह ट्राफी का हकदार बनाया।डॉस की वे अपनी लाईफ मानती है एवं वे कहती हैं कि डॉस के बिना वो साँस लेने का भी नहीं सोच सकती।
उनका कहना है कि कथक में डेडिकेशन और डिवोशन ने उन्हें डॉस के लिए प्रोत्साहित किया। वे बताती है कि उनके हसबैंड ने उन्हें बहुत सर्पोट किया है और वे आज जो भी है अपने हसबैंड की वजह से हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी के पहलुओं के बारे में बताया की उन्हें उनकी जिंदगी में मिली तकलीफों ने आगे बढ़ाया, उन्होंने कई मुश्किलों का सामना किया रेल्वे स्टेशन पर रातें बिताई लेकिन डॉस को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि कई बार लोगों ने उनका मजाक बनाया कि ये लड़की क्या डॉस करेगी लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। मिसेस रागिनी डॉंस के अलावा सिंगीग और राइटिंग का भी शौक रखती है। वे म.प्र. में एक ऐसा आर्ट सेंटर खोलना चहाती है जहाँ सभी आर्टिस्ट को मौका मिले। वे कहती है कि म.प्र. में लोगों को वे आगे बढ़ाना चाहती हैं और जो लोग पैसों की वजह से आगे नहीं बढ़ सकते उन्हें मौका देना चाहती है। अपनी एकेडमी के बारे में उन्होंने बताया की एकेडमी हर उस कथक एकेडमी के लिए होगी जो गुरु शिष्य परम्परा की अपनाकर मेहनत के साथ काम करें। उन्होंने बताया कि अभी नादयोग एकेडमी में २७ स्टूटेंड फ्री ऑफ कास्ट डॉस सीख रहे हैं। वे कहती है कि वे हमेशा डाउन टू अर्थ रहना चाहतीा है। अपनी कला को महत्व देती है एवं उनके हसबैंड उनके लिए म्युजिक तैयार करते है। अपनी बातों से उन्होंने यूथ को मैंसेज देकर कहा कि डेलिकेशन, हार्डवर्क, डिवोशन, सच्चाई ये चीजें अपने साथ रखों तो सफलता आपके कदम चुमेगी। उन्होंने कहा कि एक पंजाबी होने के बावजूद आज वे अपने हसबैंड जो मराठी हैं उनके साथ एक रंग में रंगकर जिंदगी को कथक के साथ जी रही हैं। –

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