फिल्म रिव्यु :- हवा हवाई

पर्फोर्मेंस
चाइल्ड आर्टिस्ट पार्थो को देखकर ये यकीन हो रहा है कि हर बीतते बरस के साथ उनकी उमंग जवां हो रही है. इस लड़के की एक्टिंग देखकर आंखें भर आती हैं. अपनी मां के सामने बड़प्पन दिखाता, दोस्तों के सामने बराबरी की जमीन पर आ जाता, गुरु के सामने सब कुछ सीखने का संकल्प जीम बैठ जाता पार्थो सिनेमाघर में नहीं छूटता. हमारे भीतर उजास की तरह साथ आता है. एक एक्टर के लिए इससे बड़ी कामयाबी और क्या हो सकती है.
स्केटिंग कोच के रोल में साकिब हसन हैं. उन्हें इससे पहले हमने मेरे डैड की मारुती में देखा था. बतौर एक्टर वह कुछ बेहतर हुए हैं, लेकिन अभी काफी गुंजाइश बाकी है.
फिल्म के बाकी चाइल्ड आर्टिस्ट और दूसरे एक्टर्स ने कमाल का काम किया है. मसलन, अर्जुन की मां की भूमिका में नेहा जोशी. इस किरदार के हिस्से ज्यादा संवाद नहीं आए हैं, मगर कैमरा जब भी उनकी आंखों पर ठहरता है. मायूसी, मुस्कान और ममता को नए शब्द मिल जाते हैं.
फिल्म का म्यूजिक भी सरसराती हवा की तरह साथ चलता है, कहीं भी रफ्तार में बाधा खड़ी नहीं करता.
अमोल गुप्ते ने बतौर कहानीकार और डायरेक्टर एक बार फिर कल्पना की नई उड़ान भरी है. अर्जुन की कहानी कहने के क्रम में उन्होंने समाज की कई परतें जो दबी छिपी रहती हैं, या जिन्हें देखने से हम बचते हैं, ऐन हमारी आंखों के सामने बोल्ड रंगों में उतार कर रख दी हैं. अब विकल्प दो हैं. या तो अंधे होने का ढोंग किया जाए या इस सच को कुबूल कर बदलने की कोशिश की जाए. फिल्म का हर शख्स यही कोशिश करता नजर आता है.

    'No new videos.'

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