अगले 15 वर्षों में हिंदी अखबारों को नए पाठक ढूंढना मुश्‍किल हो जाएगा

sourse:-महेश कुमार, समाचार संपादक, पंजाब केसरी, चंडीगढ़

पूरे 188 साल की हो गई है आज हमारी हिंदी पत्रकारिता। बदलाव के बड़े-बड़े दौर देखे। गुरबत और संघर्ष की अंधेरी सुरंग में स्‍वाभिमान के साथ एक सदी से भी ज्‍यादा वक्‍त गुजार दिया। उसी गौरवमयी इतिहास पर आज हिंदी पत्रकारिता चमाचम है। प्रसार के आंकड़े बड़े-बड़े हैं। विज्ञापनों की बिलिंग भी मोटी-मोटी है। बड़े और मध्‍यम ही नहीं, बल्‍कि स्‍थानीय हिंदी अखबारों में भी विज्ञापनों का टोटा नहीं।

आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हालात भले ही बदल गए, लेकिन हिंदी पत्रकारिता आज फिर से उसी जगह खड़ी है, जहां पं. जुगल किशोर शुक्‍ल के वक्‍त थी। अबकी बार चुनौतियां संभवत: उससे भी जटिल हैं। पंडित जी को महज डेढ़ वर्ष में अखबार क्‍यों बंद करना पड़ा था? आर्थिक तंगी की वजह से ही ना? लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि उनका अखबार घाटे का सौदा क्‍यों बना? जवाब है, जब पाठक ही नहीं होंगे तो अखबार कैसे चलेगा। उदंत मार्तंड कलकत्‍ता में छपता था, जहां हिंदी पढ़ने में बहुत कम लोगों की दिलचस्‍पी थी। उन्‍हें बांग्‍ला, अंग्रेजी और उर्दू के अखबार वहां आसानी से मिल रहे थे। उदंत मार्तंड के असली पाठक तो कलकत्‍ता से काफी दूर बिहार, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली और मध्‍य प्रदेश जैसे इलाकों में थे। ब्रिटिश सरकार ने डाक खर्च माफ नहीं किया और अखबार असली पाठकों तक नहीं पहुंच पाया।

मतलब यह कि रेवेन्‍यू जुटाने के लिए अखबार पाठकों के हाथ में पहुंचना बहुत जरूरी है। अन्‍यथा विज्ञापन नहीं मिलेगा। बिना रेवेन्‍यू कोई भी अखबार लंबे समय तक नहीं चल सकता, भले ही कितने भी बड़े धन्‍ना सेठ का क्‍यों न हो। हिंदी पत्रकारिता, खासकर अखबारों के समक्ष आज फिर से पाठकों की चुनौती पैदा हो गई है।

मोबाइल और कम्‍प्‍यूटर युग में जन्‍मी पीढ़ी सुबह चाय की चुस्‍कियों के साथ अब अखबार नहीं पढ़ती। सूचनाएं देने का बेसिक काम उनका स्‍मार्ट फोन/टैब बखूबी करता है। जब लाइव अपडेट्स उपलब्‍ध हैं तो 24 घंटे बाद अखबार का इंतजार कौन करेगा? स्‍मार्टफोन/टैब पर अपडेट रहने वाले अगर सुबह अखबार देखें तो उन्‍हें पेज डिजाइन के अलावा सारी चीजें बासी लगेंगी। फेसबुक, ट्विटर, न्‍यूज वेबसाइट्स, एप्‍स के नोटीफिकेशन, ई-मेल अलर्ट्स जैसी तमाम चीजें यूजर को चौबीसों घंटे अपडेट रखती हैं। अखबारों, खासकर हिंदी में वहीं खबरें और प्‍वाइंट्स ज्‍यों की त्‍यों कॉपी-पेस्‍ट मिलती हैं (एकाध अपवाद छोड़कर ज्‍यादातर हिंदी अखबारों की स्‍थिति यही है), जो इंटरनेट पर उपलब्‍ध हैं। टेक्‍नो सैवी पीढ़ी को अगर अखबार पढ़ना भी पड़े तो उनकी पहली पसंद ई-पेपर/एम-पेपर होते हैं। यह इस मीडियम की ताकत ही है कि तमाम मीडिया घरानों ने सोशल साइट्स पर अकाउंट बना रखे हैं और सभी ऑपरेटिंग सिस्‍टम्‍स के प्‍लेटफॉर्म्‍स पर उनकी एप्‍स उपलब्‍ध हैं। इन अकाउंट्स और एप्‍स के साथ जुड़ने वालों की संख्‍या लाखों में है और यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। अखबारों के लिए खतरे की घंटी इसलिए है, क्‍योंकि यह तकनीक चाय के साथ ब्रॉडशीट पढ़ने वाली पीढ़ी में भी तेजी से पैठ बना रही है।

मौजूदा टेक्‍नोलॉजी के आधार पर कह सकते हैं कि अगले 15 से 20 वर्षों के अंदर-अंदर हिंदी अखबारों को नए पाठक ढूंढना मुश्‍किल हो जाएगा। ब्रॉडशीट पढ़ने वाली पीढ़ी जैसे-जैसे आगे सरकेगी, ये बातें ज्‍यादा स्‍पष्‍ट रूप में हमारे सामने आएंगी। हां, अगर स्‍टीव जॉब्‍स जैसे किसी व्‍यक्‍ति ने इस दौरान आई.टी. या मोबाइल फोन से जुड़ा कोई और इनोवेटिव आइडिया/प्रोडक्‍ट मार्केट में उतार दिया तो यह स्‍थिति थोड़ा पहले भी पैदा हो सकती है। कंटेंट की मजबूती के आधार पर अंग्रेजी अखबार कुछ और (बहुत ज्‍यादा नहीं) वक्‍त तक इस प्रभाव से बचे रह सकते हैं।

अब सवाल यह है कि आखिर हिंदी अखबारों को ज्‍यादा खतरा क्‍यों है? हरेक अखबार के आधार पर इस सवाल के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कंटेंट की कमजोरी एक कॉमन वजह है। अक्‍सर आइडियाज और मैनपावर के अकाल से जूझते डेस्‍क के ज्‍यादातर साथी दूसरे अखबारों और चैनल्‍स की वेबसाइट्स पर ही एंगल और वैल्‍यू एडिशन के पॉइंट्स ढूंढते रहते हैं। वे अपना दिमाग नहीं लगाते हैं। जरूरत से ज्‍यादा वर्क लोड के चलते उनके पास दिमाग लगाने का टाइम भी नहीं होता। 5-6 बड़े अखबारों में काम के दौरान मैंने हर जगह यह चीज आब्‍जर्व की है। यही प्रवृत्‍ति अखबार के लिए धीमा जहर है। जब तक इंटरनेट सीमित लोगों की पहुंच में था, तब तक कॉपी-पेस्‍ट और ट्रांसलेशन चल जाता था, लेकिन अब नई पीढ़ी के पाठकों के हाथ में 3जी स्‍पीड के साथ स्‍मार्ट फोन/टैब हैं, तो चोरी चुटकी में पकड़ी जाएगी और हर कोई कहेगा ‘नो उल्‍लू बनाविंग’।

अगर अपना वजूद बचाना है तो आने वाले कुछ वर्षों में अखबारों को सिर्फ बेसिक इन्‍फॉर्मेशन देने वाला फॉर्मेट बदलना पड़ेगा। दैनिक भास्‍कर, राजस्‍थान पत्रिका सरीखे अखबार संडे जैकेट के रूप में करीब 3 साल पहले ही ऐसी शुरुआत कर चुके हैं। आने वाले दिनों में संडे की बजाय रोज ही ऐसा फॉर्मेट दिखे तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए। यह बात तो तय है कि रूटीन के समाचारों से हटकर कोई नया फॉर्मेट नहीं अपनाया तो अगले कुछ वर्षों में नए पाठकों को अपने साथ जोड़ना अखबारों के लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है।

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