किचन के वेस्ट से बनाई बायोगैस, अब बन रहा 120 लोगों का खाना

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इंदौर. किचन से रोज निकलने वाले अनुपयोगी खाद्य पदार्थ (सब्जी, बची हुई रोटी और अन्य वेस्ट) आमतौर पर लोग कचरे में फेंक देते हैं लेकिन राजा रमन्ना प्रगत प्रौद्योगिक केंद्र (आरआर कैट) में इस वेस्ट से बायोगैस बनाई जा रही है। रोजाना 120 लोगों का चाय-नाश्ता और खाना बन रहा है। बायोगैस बनने के बाद भी जो वेस्ट निकलता है, उससे खाद बनाई जा रही है। एक वेजिटेबल गार्डन भी डेवलप हो गया है।

कैट कॉलोनी में 965 घरों से डोर-टू-डोर रोजाना कचरा एकत्रित किया जाता है। एक बैग में किचन से निकलने वाले बायोडिग्रेडेबल वेस्ट और दूसरे में घर के अन्य कचरे को इकट्ठा करते हैं। बायोडिग्रेडेबल वेस्ट को बायोगैस प्लांट में डाला जाता है। इससे वर्तमान में रोजाना आधे सिलेंडर से ज्यादा बायोगैस मिल रही है। इस गैस से कैट के गेस्ट हाउस में चाय-नाश्ता और खाना बनाया जा रहा है। कैट के सुप्रींटेंडेंट इंजीनियर एस.एम. जलाली के अनुसार बायोगैस प्लांट में एक मैट्कि टन (हजार किलो) कचरा प्रतिदिन डालकर गैस बनाई जा सकती है लेकिन अभी रोजाना 400-500 किलो गैस बन रही है। रोजाना औसत आधा सिलेंडर (सात किलो) गैस बन रही है। इस गैस से कैट के गेस्ट हाउस में खाना बनाया जा रहा है।

ग्रीन एंड क्लीन कैंपस बनाने की पहल लाने लगी रंग

जुलाई-2014 में प्लांट शुरू हुआ था। इसकी लागत 17 लाख रुपए आई थी। डॉ. शरद काले के मार्गदर्शन में यह प्लांट लगाया गया था। प्लांट लगने से कचरा भी व्यवस्थित एक जगह इकट्ठा होना लगा। लोग भी कैट कॉलोनी को ग्रीन एंड क्लीन कैंपस बनाने की दिशा में पहल की।

खाद से संवरा बगीचा

बायोगैस बनने के बाद प्लांट से निकले हुए वेस्ट का उपयोग खाद के रूप में किया जा रहा है। जलाली ने बताया कैट में ही एक वेजिटेबल गार्डन भी बनाया गया है। इसमें लगाई सब्जियों में यह खाद डाली जाती है। किचन के वेस्ट का पूरा प्रयोग किया जा रहा है।

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