पिंक रिक्शा के लिए महिला ड्राइवरों का इंतजार, एक भी आवेदन नहीं मिला

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इंदौर. शहर में महिलाओं के सुरक्षित सफर के लिए परिवहन विभाग ने विशेष ऑटो रिक्शा सेवा की योजना बनाई थी। ये ऑटो चलाने वाली महिलाओं को विभाग तुरंत परमिट और लाइसेंस देने को भी तैयार है, लेकिन एक भी आवेदन नहीं आया है। इस तरह की कार टैक्सी सेवा को दिल्ली में सराहा जा रहा है। झारखंड में कुछ दिन पहले ही ऐसी ही पिंक रिक्शा शुरू की गई है।

18 दिसंबर 2014 को खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री विजय शाह ने इंदौर में अधिकारियों की बैठक ली थी। इसमें उन्होंने आरटीओ डॉ. एमपी सिंह से कहा था कि वे शहर में महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा चलाई जाने वाली रिक्शा सेवा की शुरुआत करवाएं। इसके लिए महिलाओं को तुरंत लाइसेंस और परमिट देने की व्यवस्था भी करें।
उन्होंने घोषणा की थी कि ऐसी पहली 20 रिक्शा में शासन की ओर से जीपीएस भी लगवाया जाएगा। मंत्री के आदेश पर परिवहन विभाग ने इसकी तैयारी भी कर ली है, लेकिन इस योजना के तहत अब तक एक भी महिला ने रिक्शा चलाने के लिए न तो लाइसेंस मांगा है, न ही परमिट के लिए आवेदन किया है।
महिलाएं आगे आएं
आरटीओ सिंह ने कहा इस योजना से महिला यात्रियों को जहां सुरक्षित सफर मिलेगा, वहीं ऐसी रिक्शा का संचालन करने वाली महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा। उन्होंने बताया शासन और बैंकों की योजनाओं के तहत महिलाएं ऑटो रिक्शा लेकर इस योजना से जुड़ सकती हैं। परिवहन विभाग के मुताबिक, शहर में 121 महिलाओं के पास कमर्शियल व्हीकल ड्राइविंग लाइसेंस है।
रांची में गुलाबी ऑटो रिक्शा चला रही हैं महिलाएं
महिलाओं को सुरक्षित सफर देने के लिहाज से झारखंड के रांची में पिछले कुछ समय से पिंक ऑटो रिक्शा के नाम से 30 से ज्यादा रिक्शा चल रहे हैं, जिन्हें महिलाएं ही चलाती हैं और इनमें महिलाएं ही सफर भी कर सकती हैं।
अलग पहचान के लिहाज से इन्हें गुलाबी रंग दिया गया है और इनकी ड्राइवर भी गुलाबी रंग की ड्रेस में रहती हैं। वहीं दिल्ली में महिलाओं के लिए विशेष कार टैक्सियां भी चलती हैं, जिन्हें महिलाएं ही चलाती हैं। इन सेवाओं को बहुत सराहा भी जा रहा है।
महिला कंडक्टरों की योजना भी नहीं हो पा रही पूरी
शैक्षणिक संस्थानों के वाहनों में छात्राओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाओं को रोकने के लिए कुछ समय पूर्व कलेक्टर ने सभी संस्थाओं को आदेश दिए थे कि वे अपने वाहनों में महिला कंडक्टर रखें, लेकिन महिलाओं की अरुचि के चलते यह योजना भी पूरी नहीं हो पा रही है। हालत यह है कि शहर में अभी एक भी महिला के पास कंडक्टर लाइसेंस नहीं है। इसके चलते शैक्षणिक संस्थान चाहकर भी महिला कंडक्टरों की नियुक्ति नहीं कर पा रहे हैं। न ही वे अपने संस्थानों में नियुक्त महिलाओं को लाइसेंस लेने के लिए भेज रहे हैं।

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