बैंक ने लोन नहीं दिया तो आदिवासी महिलाओं ने बनाया खुद का बैंक

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बड़वानी. महिलाओं का सहकारी बैंक। यथा नाम तथा गुण ‘समृद्धि ’। पहले अपने गांव की जरूरतमंद महिलाओं को सशक्त बनाया। 70 लाख रुपए का लोन भी बांटा। अब दूसरे गांव की महिलाओं को सबल करने निकल पड़ी हैं। ये वे ही महिलाएं हैं जिन्हें कुछ साल पहले बैंक ने लोन देने से मना कर दिया था। तब इन्होंने खुद का बैंक खोलने का न सिर्फ निश्चय किया बल्कि सफलता से कर भी दिखाया।
कामयाबी और महिला सशक्तिकरण की यह मिसाल कायम की है बड़वानी जिले के गंधावल की आदिवासी महिलाओं ने। खुद में गांव में महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के बाद इन्होंने पाटी में बैंक की एक शाखा खोल दी। इस बैंक में भी अध्यक्ष से लेकर तमाम स्टाफ महिलाओं का ही है। ब्रांच खोलने से पहले इसी बैंक की महिलाओं ने पाटी में ट्रेनिंग सेंटर भी खोला।
जिद करके ऐसे निकलीं दुनिया बदलने
करीब चार साल पहले गंधावल की इन महिलाओं ने खेती के लिए एक राष्ट्रीयकृत बैंक से ऋण मांगा था, लेकिन उन्हें मना कर दिया। महिलाएं तो जिद्दी थीं। दुनिया बदलना चाहती थीं। गंधावल बैंक की अध्यक्ष रेवाबाई ने बताया कि उन्होंने खुद की बैंक खोली। मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से 2011 में समृद्धि स्वायत्त साख सहकारी संस्था मर्यादित बैंक का पंजीयन कराया।
बैंक खोलने का मकसद था महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। उसे िजले के दो बैंक, नर्मदा झाबुआ व बैंक ऑफ इंडिया ने साख के आधार पर एक साल में िलमिट 11 लाख रुपए बढ़ा दी। 2013 में बैंक ने 13 लाख रुपए लिमिट तय की थी। 2014 में इसे बढ़ाकर 24 लाख कर दिया है। बैंक अब तक करीब 98 लाख रुपए का लोन बांट चुकी है। बचत है 30 लाख रुपए और 2800 लोग अब बैंक से लोन लेकर तरक्की कर रहे हैं।

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