100 साल बाद खुलेगी किले की यह मंजिल, मुमताज ने ली थी आखिरी सांस

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प्रेम के सबसे बड़े प्रतीक ताजमहल को बनवाने वाले शाहजहां और बेगम मुमताज महल की बेहद रोमांटिक यादें मध्यप्रदेश के बुरहानपुर से भी जुड़ी हैं। शाहजहां ने आगरा का ताजमहल तो अपनी प्रिय बेगम की मौत के बाद उनकी याद में बनवाया था, लेकिन शाहजहां और मुमताज बेगम का प्यार तो बुरहानपुर में बने फारुखी काल के शाही किले में ही परवान चढ़ा था। इस किले की दरों-दीवारें ही नहीं कमरों से लेकर दालान और हमाम तक आज भी शाहजहां और मुमताज के हसीन प्यार के गवाह हैं।
बतौर बुरहानपुर गवर्नर शाहजहां इस किले में लगभग पांच वर्ष तक रहे। यह किला शाहजहां को इतना पसंद था कि अपने कार्यकाल के पहले तीन वर्षों में ही उन्होंने किले की छत पर दीवाने आम और दीवाने खास नाम से दो दरबार बनवा दिए थे। शाहजहां ने किले में इस सबसे अलहदा एक ऐसी चीज बनवाई थी, जहां वे अपनी बेगम के साथ सुकून के पल बिताते थे। मुमताज की मौत भी बुरहानपुर में ही हुई थी। शायद बहुत कम लोग यह जानते होंगे की ताजमहल बनने तक मुमताज का मृत शरीर यहीं दफनाया गया था।
अब इस शाही किले को देखने वाले पर्यटकों के लिए एक अच्छी खबर आई है। शाही किले की तीसरी मंजिल करीब 100 साल बाद खोली जाएगी। पर्यटक चौथी मंजिल से नीचे उतरकर तीसरी मंजिल पर पहुंच सकेंगे। इसके लिए चौथी मंजिल पर स्लैब डाला जा रहा है। यहां मरम्मत कर स्लैब को मजबूती दी जा रही है। बारिश से पहले यह काम पूरा हो जाएगा। इसके बाद तीसरी मंजिल खोली जाएगी। इससे पहले यहां पर्यटकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

100 साल बाद देख पाएंगे पर्यटक : पुरातत्व संरक्षक राकेश शेंडे ने बताया करीब 100 साल बाद पर्यटक तीसरी मंजिल देख सकेंगे। चौथी मंजिल की छत टूटकर गिर गई थी। जर्जर होने के कारण पर्यटकों के लिए तीसरी मंजिल भी बंद कर दी गई थी। अब इसकी मरम्मत कराई जा रही है।
8 दिन पहले शाही किले की चौथी मंजिल पर स्लैब डालना शुरू किया है। स्लैब डालने के बाद चौथी मंजिल के नीचे सहारा देने के लिए आर्च तकनीक से त्रिकोणीय स्तंभ बनाया जाएगा। इसमें सीमेंट, ईंट, सरिए का उपयोग नहीं किया जाएगा। इसके लिए चूना, सुरखी, रेत का मिश्रण बनाया जा रहा है। यह मिश्रण पुरानी पद्धति से बैलों को गट्‌टे में चलाकर तैयार किया जा रहा है। चौथी मंजिल पर 1 हजार स्क्वेयर फीट में काम किया जा रहा है। प्रस्ताव बनाकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को भेजा गया है।

चौथी मंजिल पर लगा है प्रतिबंध : पुरातत्व संरक्षक राकेश शेंडे ने बताया चौथी मंजिल का स्लैब गिरे 100 से अधिक साल हो गए हैं। जर्जर होने के कारण तीसरी मंजिल पर प्रवेश बंद कर दिया गया था। मरम्मत और स्लैब डालने के बाद इसे पर्यटकों के लिए खोला जाएगा। सुरक्षा को लेकर विचार किया जाएगा। पूरी तरह सुरक्षित होने के बाद ही तीसरी मंजिल पर्यटकों के लिए खोली जाएगी। चौथी मंजिल का स्लैब जर्जर होने के कारण सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर तार फेंसिंग की गई है। श्री शेंडे ने बताया शाही किले की सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर बाउंड्रीवाॅल बनाई जाएगी।

ऐसा है किले का इतिहास : सन् 1603 ई से मुगल बादशाह के आगमन का क्रम निंरतर जारी रहा था। शाहजहां बुरहानपुर के सूबेदार थे। 1621 ई में दक्षिण पर आक्रमण के सिलसिले में वह कई वर्ष तक यहां रहे थे। इस अवधि में अनेक शानदार इमारतें बनवायी गयीं। विशेषकर दीवान ए आम बनवाया गया। तीन वर्षों तक यहीं दरबार सजाया गया।
शाहजहां के अतिरिक्त भी अन्य मुगल बादशाहों का इसमें निवास रहा। औरंगजेब, मोहम्मद शुजा और शाह आलम ने भी इस किले में निवास किया था। इसी महल की तीसरी मंजिल पर मुमताज महल ने चौदहवें बच्चे को जन्म दिया और यही सात जून 1639 ई के प्रात: काल होने से पूर्व शाहजहां की गोद में अपनी जिंदगी की अंतिम सांस ली। उन्हें ताप्ती नदी के किनारे जैनाबाद के प्रसिद्ध बाग में दफनाया गया था।

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