गीत-नज्मों से दिल जीता

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13 Guljar इंदौर. डीएवीवी सभागार में ख्यात शायर और फिल्मकार गुलज़ार ने ‘रूबरू गुलज़ार’ में अपने मन की, गीतों-नज्मों की और फिल्मों की बातें की। शायरी का असली मर्म- मैं जब अपनी शायरी मैं मौसम की बात करता हूं तो वह सिर्फ मौसम की बात नहीं होती। बादल की बात करूंगा तो वह सिर्फ बादल की बात नहीं होगी। जैसे मैं बादल की जेबें टटोलता हूं तो देखता हूं उसकी जेब में पानी कहां छिपा है। वह किस पर बरसेगा। उसने बिजलियां के हंटर कहां छिपा रखें। वे किस पर चलेंगे और किस को छोड़ देंगे। यह शायरी का असली मर्म है। यह मौसम के बहाने एक सोशल, पॉलिटिकल कमेंट भी करता है। त्रिवेणी के बारे में- यह फॉर्म बनाया तो पता नहीं था कि यह किस संगम तक पहुंचेगी – त्रिवेणी नाम इसीलिए दिया था कि पहले दो मिसरे, गंगा-जमुना की तरह मिलते हैं और एक ख्याल, एक शेर को मुकम्मल करते हैं लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है सरस्वती। यह जो गुप्त है, नज़र नहीं आती; त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है। गीतकार के लिखे में तहें होती हैं : गीतकार के लिखे में तहें होती हैं। पहली तह के नीचे दूसरी तहें होती हैं। जैसे बीड़ी जलई ले, जिगर मा बड़ी आग है। यह पहली तह है। लेकिन दूसरी तह में देश की पूरी जमींदारी प्रथा का बखान है। अब सिर्फ लिखना चाहता हूं : फिल्म एक टीम वर्क है। उसमें एक लेखक का सौ प्रतिशत नहीं होता लेकिन यदि वह सिर्फ लिखता है तो वह उसके मन का सौ प्रतिशत होता है। इसलिए अब मैं लिखना सिर्फ लिखना चाहता हूं।

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