जानिए ये बातें पर्ल्स खरीदने से पहले

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पर्ल्स दर्शाते हैं सादगी, निर्मलता और लक्ज़री. सालों से इसे शाही घराने के लोग और जूलरी में अलग सी पसंद रखने वाले लोग पसंद करते आए हैं. जूलरी हमेशा से दो भागों में विभाजित रही है, एक वो जो बेहद ग्रैंड होती हैं और दूसरा बेहद मिनिमलिस्ट टेस्ट वाले लोगों के लिए. पर्ल जूलरी इन दूसरे किस्म के लोगों के बीच काफी पसंद की जाती है – जो ग्लैमर से ज़्यादा ग्रेस को तरजीह देते हैं. टेक्निकल भाषा में पर्ल्स को ‘ऑर्गैनिक जेम्स’ कहा जाता है, जिन्हें शेलफिश से पाया जाता है. और इस प्रक्रिया में पिछले 4000 सालों में कोई बदलाव नहीं आया है. पर बाज़ार में बढ़ती सिंथेटिक पर्ल्स की तादाद के साथ, जो बिल्कुल असली पर्ल्स जैसे ही दिखते हैं, इन बातों का ध्यान रखना है बेहद ज़रूरी.
पर्ल्स की किस्म – मुख्य तौर पर तीन तरह के पर्ल्स होते हैं. फ्रेशवॉटर पर्ल्स जो फ्रेश वॉटर बॉडीज़ जैसे कि तालाब, झील और नदियों में पाए जाते हैं (और वहीं से इसे ये नाम मिलता है). ये ‘mussels’ में पाए जाते हैं पर ज़्यादा फिशिंग और प्रदूषण की वजह से ये काफी दुर्लभ हैं. दूसरे तरह के पर्ल्स हैं सॉल्टवॉटर पर्ल्स जो समुद्र में oysters में उगते हैं और बेहद महंगे होते हैं. सबसे आम तरह के पर्ल्स होते हैं कलचर्ड पर्ल्स, जिनका दुर्लभ या कीमती होने से कोई लेना-देना नहीं है. कलचर्ड का सीधा मतलब है कि इनकी देखरेख पर्ल फार्म पर की गई है. ये प्राकृतिक होते हैं पर कल्टीवेटेड.
पर्ल टेस्ट – पर्ल्स को अपने दांतों के आगे की तरफ घिस कर देखें. ये पर्ल की असलियत जांचने का सबसे आसान तरीका है. पर्ल को अपने अंगूठे और बीच की उंगली के बीच में पकड़ें और इसे अपने आगे वाले दांत पर घिसें. इसे एक दिशा से दूसरी दिशा की तरफ घिसें. उगर पर्ल नकली हुआ तो ये आपको बेहद चिकना महसूस होगा वहीं असली पर्ल आपको खुरदुरा महसूस होगा.
चमक का ध्यान रखें – ये पर्ल की सतह की चमक और उसकी रिफ्लेक्शन की इंटेंसिटी के बारे में है. ज़्यादा चमक वाले पर्ल्स की सतह पर चीज़ों का बेहतर प्रतिबिंब नज़र आता है. पर्ल की चमक उसकी गुणवत्ता और ब्रिलिएंस का माप होता है. जितनी ज़्यादा चमक, उतनी अच्छी क्वॉलिटी.
सर्फेस क्वॉलिटी – पर्ल्स प्राकृतिक रूप से उगाए जाते हैं. कभी-कभी दागदार सर्फेस की भी मांग की जाती है. हालांकि जितनी साफ और चिकनी सतह उतनी बेहतर क्वॉलिटी. फ्रेशवॉटर पर्ल्स कभी-कभी बिल्कुल बेदग और चमकदार होते हैं, जो इन्हें बनाता है दुर्लभ, महंगा और बेहद मांग में.
रंग – पारंपरिक तौर पर पर्ल्स सफेद होते हैं (ओरिजनल व्हाइट फ्रेशवॉटर पर्ल्स बेहद दुर्लभ होत हैं). बदलते समय और पर्ल्स की भारी मांग के चलते, इन्हें अकसर लाइट लाइलैक, पिंक या पीच के हल्के टिंट्स के साथ ब्लीच किया जाता है. ब्लीच किए हुए पर्ल्स बेहद आम हैं और बहुत महंगे भी नहीं हैं.
नैकर (Nacre) – नैकर यानि की वो कोटिंग जो mollusk से निकलती है. पर्ल की ऊपरी सतह इसी से ढकी होती है. अगर पर्ल को सीपी के अंदर 6 महिने या उससे ज़्यादा के लिए उसके अंदर छोड़ दिया जाए तो ये परत बेहद पतली हो जाएगी. और इस तरह मोती बेहद चमकदार और टिकाऊ हो जाएगा. तो जितना पतला नैकर उतनी बेहतर पर्ल की क्वॉलिटी.
आकार – राउंड शेप्ड पर्ल सबसे ज़्यादा मांग में और पॉप्यूलर पर्ल्स हैं. हालांकि पर्ल को जांचते वक्त इस बात का ध्यान रखें की गोल होने की वजह से ये फ्लैट या ओवल नहीं लगना चाहिए. नैचुरल फ्रेशवॉटर राउंड पर्ल्स सबसे ज़्यादा दुर्लभ होते हैं. ये सेमी-राउंड, बारोक, टीयर, रिंग्ड और बटन जैसे शेप्स में भी पाए जाते हैं.

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