तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो!

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हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है मकर संक्रांति। यह देश में विभिन्न राज्यों में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है। यह जनवरी के चौदहवें अथवा पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है।
इस पर्व पर तिल-गुड़ का बहुत महत्व है। इस दिन तिल, गुड़ का दान करना, दाल-चावल की खिचड़ी दान करना अत्यंत अहम है। माना जाता है कि इन वस्तुओं का दान करने से अशुभ परिणामों में कमी आती है और शुभ फल मिलने लगते हैं। इस दिन तिल-गुड़ से बने लड्‍डू, पपड़ी, और कई प्रकार के व्यंजन ही बनाना चाहिए। साथ ही तिल के उबटन से नहाना चाहिए। महाराष्‍ट्र में इस दिन तिल और गुड़ के व्यंजन महमानों को खिलाते वक्त कहा जाता है- ‘तिड़ घ्या आणि गुड़-गुड़ बोला’। महिलाएं पारंपरिक इन व्यंजनों को अड़ोस-पड़ोस में वितरित करती हैं।
सुहागिन महिलाएं अन्य महिलाओं और रिश्तेदारों में सुहाग की सामग्री भी वितरित करती है। महिलाएँ अपने घर महिलाओं को आमंत्रित कर उन्हें हल्दी-कुमकुम लगाती हैं और तिल-गुड़ के व्यंजन के साथ उपहार वितरित करती हैं। यह एक बहुत ही शुभ शगुन माना गया है। माना जाता है कि इससे आपसी प्रेम बढ़ता है और सुहाग की लंबी आयु होती है।
गुजरात में इस दिन दान-धर्म ज्यादा माना जाता है। खिचड़ी के दान का महत्व है। यहां बडे़ पैमाने पर पतंगबाजी के मुकाबले होते हैं। यहां इस दिन करीब दो करोड़ रुपए की पतंग उड़ा दी जाती है।
इसी मकर संक्रांति के पर्व को तमिलनाडु-आंध्रप्रदेश में पोंगल पर्व के रूप में मनाते हैं। यह सूर्य पर्व है, जिसकी आराधना हर जगह होती है। कर्नाटक, केरल में भी यह श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
पंजाब और हरियाणा में यह पर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की आराधना की जाती है। वहां भी तिल-गुड़ की गजक, चावल और मक्के की आहूति दी जाती है।पंजाबी लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिए लोहड़ी का काफी महत्व है।

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