इस ट्रेन से शुरू हुई थी ‘इंडियन रॉबिनहुड’ की कहानी

indian robinhood

इंदौर.पातालपानी का सुंदर और अद्भूत झरना देखने के लिए ‘इंदौर-महू-पातालपानी’रूट पर ट्रेन से खूबसूरत वादियों का सफर बेहद यादगार अनुभव था। जिसकी यादें आज भी सभी के जेहन में ताजा हैं। इसी रूट की ट्रेन से ही इंडियन रॉबिनहुड के नाम से पहचाने जाने वाले ‘टंट्या भील’ की कहानी शुरू हुई थी।
दरअसल देश में अंग्रेजों के साम्राज्य के दौरान टंट्या मामा ने अंग्रेजों को लूटकर गरीबों की भूख मिटाई थी। इसके बाद वे गरीब आदिवासियों के मसीहा बनकर सामने आए थे। बताया जाता है कि महू-पातालपानी रूट की ट्रेनों में टंट्या मामा अंग्रेजों के माल की लूट करके आदिवासियों की भूख मिटाते थे।
टंट्या भील का जन्म तत्कालीन सीपी प्रांत के पूर्व निमाड़ (खंडवा) जिले की पंधाना तहसील के बडदा गांव में सन 1842 में हुआ था। टंट्या का शब्दार्थ समझें तो इसका अर्थ है झगड़ा। टंट्या के पिता माऊ सिंग ने बचपन में नवगजा पीर के दहलीज पर अपनी पत्नी की कसम लेकर कहा था कि उनका बेटा अपनी भील जाति की बहन, बेटियों, बहुओं के अपमान का बदला अवश्य लेगा। नवगजा पीर मुसलमानों के साथ-साथ भीलों के भी इष्ट देवता थे।

आम मान्यता है कि उनकी शहादत 4 दिसम्बर 1889 को हुई। फांसी के बाद टंट्या के शव को इंदौर के निकट खण्डवा रेल मार्ग पर स्थित पातालपानी (कालापानी) रेल्वे स्टेशन के पास ले जाकर छोड़ दिया गया था। जिसके बाद वहां एक समाधि स्थल पर टंट्या मामा की समाधि बनाई गई। आज भी सभी रेल चालक पातालपानी पर टंटया मामा को सलामी देने कुछ क्षण के लिये रेल को रोकते हैं।

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