नहीं लगा सके शाह राजनीतिक डुबकी

मध्यप्रदेश के उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ महाकुंभ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संतों के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई.लेकिन इससे पहले मंगलवार को उनके तय कार्यक्रम समरसता स्नान और शबरी भोज को स्थगित कर दिया गया था.

शाह के राम घाट पर समरसता स्नान के मुद्दे के तूल पकड़ लेने के कारण यह कार्यक्रम रद्द करना पड़ा और उसका नाम संत समागम कर दिया गया.

अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिये पहली बार अलग से स्नान का आयोजन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में होना था.साधु संतों के साथ कांग्रेस और आरएसएस का एक धड़ा भी इस कार्यक्रम के विरोध में आ गया था. इसके बाद भाजपा ने अपने क़दम पीछे किए और नाम के साथ ही जगह भी बदल डाली.

माना जा रहा था कि भाजपा की नज़र अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव पर थी. यही वजह है कि पहली बार कुंभ के दौरान दलितों के लिये अलग से स्नान का आयोजन किया जा रहा था.

आरएसएस के वरिष्ठ नेता प्रभाकर केलकर ने ही सरकार पर हमला बोल दिया और कहा कि इससे सामाजिक भेदभाव बढ़ेगा. इससे पहले जगतगुरु शंकरार्चाय स्वरूपानंद सरस्वती इसे नौटंकी क़रार दे चुके थे.

वही विपक्षी कांग्रेस भी इसका खुलकर विरोध कर रही थी, हालांकि कांग्रेस का मानना है कि इस तरह से सरकार ने धार्मिक कार्यक्रमों में राजनीतिक हस्तक्षेप की शुरुआत कर दी है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने आरोप लगाया कि सरकार ने सिंहस्थ का ‘भाजपाकरण’ कर दिया.

उन्होंने कहा, “सिंहस्थ में वोट के लिए संघ लोगों को बांट रहा है. वोट की राजनीति के लिए दलितों को मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश की जा रही है.”

क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाने के बाद अमित शाह ने संतों के साथ बैठ कर चांदी की थाली में खाना भी खाया.

स्नान करने से पहले अमित शाह ने संतों का सम्मान किया और अपने छोटे से भाषण में किसी भी तरह से राजनीतिक बयान देने से बचे.

अमित शाह ने कहा, “कुंभ का निमंत्रण किसी को नहीं दिया जाता, कुंभ एक आश्चर्य करने वाली घटना है. कुंभ में ईश्वर (हर तरह की) व्यवस्था करता है.”

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