यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में दोस्ती पर बेमिसाल नाटक का मंचन

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हर रिश्ते का अपना चार्म होता है पर यह चार्म समय के साथ फीका पड़ने लगता है, जबकि दोस्ती जितनी पुरानी होती है उतनी ही गहरी होती जाती है। दोस्ती में एक डेमोक्रेसी होती है। आप निःस्वार्थ रूप से एक-दूसरे के साथ जुड़े होते हैं, इसी भाव को लेकर बुधवार शाम यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में एक दिल को छू लेने वाले नाटक ‘शहरयार जो होता कोई’ का मंचन किया गया।
रेनेसां कॉलेज द्वारा आयोजित इस नाटक की कहानी एक आम युवा की है, जिसकी अभी-अभी मुंबई में नौकरी लगी है, जब वह यह खबर लेकर अपने माता-पिता, बहन और प्रेमिका के पास ले जाता है तो उसे प्रोत्साहित करने की बजाए सभी उसे नाना प्रकार की बातें कहने लगते हैं, जो उसे हतोत्साहित करने लगती है। वहीं उसकी दोस्त उसे हर पल सही सलाह और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। हतोत्साहित होकर जब नायक अपने शिक्षक के पास पहुंचता है तो वे नायक को अपने हर रिश्ते में दोस्ती का भाव पैदा करने की सलाह देते हैं। घर पहुंचकर जैसे ही नायक अपने सभी परिजनों से दोस्त बनकर बात करता है, उसकी सभी परेशानियां हल होना शुरू हो जाती है। रिश्तों का खोया हुआ चार्म दोबारा लौट आता है और जिंदगी फिर खुशहाल बन जाती है।
नाटक में शशांक जोशी, मरीशा साकरे, प्राची रॉय और आदित्य ने मुख्य भूमिकाओं में जान डाल दी। बात-बात पर नायक के भीतर से निकलने वाले गुस्से रूपी राक्षस की भूमिका में प्रियेश श्रीमाल ने बेहतरीन अभिनय किया और नाटक में जगह-जगह हास्य का पूट डाला है।
कहानी को मजेदार और शिक्षाप्रद बनाने की जिम्मेदारी बेहतरीन ढंग से निभाई नाटक के सूत्रधार बौने यानी सिद्धार्थ धाकरे ने…, जिसके जन्म से पहले ही पिता ने उसका नाम रख दिया था ‘आदमकद’। मंच पर पूरे जोश के साथ घूम-घूम कर संवाद अदायगी करके दर्शकों का ध्यान आकर्षित करना आसान है पर सिद्ध्‌ार्थ ने अपने बेहतरीन अभिनय कौशल, वॉइस मॉल्ड्यूलेशन और संवाद अदायगी के रोचक अंदाज से एक बौने सूत्रधार के रूप में इतना खूबसूरत काम किया कि दर्शक उसके मंच पर आने का इंतजार करते। यह बौना हर पल यह बात दोहरा रहा था कि जिस दिन इन सभी किरदारों में बड़प्पन आ जाएगा उस दिन मैं भी बड़ा हो जाऊंगा। नाटक के अंत तक सभी रिश्तेदार आपस में दोस्त बन जाते हैं और बौना सचमुच बड़ा हो जाता है…।

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