आजादी के 70 साल की विकास यात्रा…!!!

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15 अगस्‍त को हमारा देश अपनी आजादी के 70 वर्ष पूर्ण कर रहा है. इसी दिन भारत ने आधी रात को अंग्रेजी हुकूमत कि नींव उखाड़कर स्वतंत्रता प्राप्‍त की थी. आजादी के साथ-साथ हमारे देश को बंटवारे का दंश भी झेलना पड़ा जिसमें भारत का पूर्वी क्षेत्र का एक हिस्सा पाकिस्‍तान नाम से एक अलग देश बन गया. आजादी के इस यज्ञ में जिन महापूरुषों ने अपने प्राणों कृी आहुति दी वे इस बंटवारे से दुखी तो निश्‍चित होते होंगे तथा पुन: जन्‍म लेकर एक भारत की कल्‍पना करते होंगे क्‍योंकि जिस लाहौर की जेल में शहीद-ए-आजम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे बलिदानियों को फांसी दी गई वह लाहौर अब पाकिस्‍तान में है.

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अब इन दोनों देशों को आजाद हुए सात दशक हो चले हैं और भारत विकास के कई पड़ाव पार कर चुका है. इसमें भारत ने बैलगाड़ी से लेकर एयर इंडिया तक का सफर तय किया है. नए नए आविष्‍कारों और तकनीकी विकास से भारत विश्‍व में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रहा है. भारत ने अपनी आजादी के उन मूल्‍यों को संजोये रखा है जिन मूल्‍यों से इसे स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हुई है. इसीलिए आजादी का यह पावन दिन हर भारतीय के ह्रदय को राष्‍ट्र के प्रति अपार प्रेम बलिदान और शौर्यपूर्ण भावनाओं से भर देता है. हमारे स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने जिस भारत का सपना देखा था उसे साकार हम भारतीयों को करना है. यही इन भारतीय सपूतों के बलिदानों को सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी और वह भी इस दिन स्‍वर्ग में उत्‍साहित हो रहे होंगे क्‍योंकि भारत प्राचीनकाल से ही अनेकता में एकता का देश रहा है तभी तो आजादी के स्‍वप्‍न को साकार करने में रामप्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्‍ला खन सरीखे महान क्रांतिकारियों ने शहीद होकर भी एकता की परंपरा का अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्‍तुत किया. वहीं दूसरी तरफ अहिंसा के पुजारी राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी सत्‍याग्रह के माध्‍यम से गोरों को देश से बाहर निकालने में सफल रहे तथा बालगंगाधर तिलक जैसी विभूतियां यह कहती थीं कि – स्‍वाधीनता मेरा जन्‍म सिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर ही रहूंगा.

ऐसे भारतमाता के अनेक सपूतों को भुलाया नहीं जा सकता. आज देश की एकता अखंडता पर प्रहार किया जा रहा है जो कि एक कोरा सपना है क्‍योंकि आज भी जब देश में कोई अप्रिय घटना घटित होती है तो प्रत्‍येक भारतीय एकता का परिचय देते हुए तन मन धन से इंकलाब के लिए प्राणों को न्‍यौछावर करने में तनिक भी विचार नहीं करता. इसका जीवंत उदाहरण कारगिल युद्ध में भारतीय सेना द्वारा प्रस्‍तुत किया जा चुका है जिसमें लांस नायक अब्‍दुल हमीद साहब ने पाकिस्‍तानी सेना के तीन पैटन टैंक ध्‍वस्‍त कर दिये और भारत मां के चरणों में अपने प्राण न्‍यौछावर कर गए.

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