मुस्लिम वुमेन बिल से कहीं खुशी कहीं अधूरी उम्मीदें..!

मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज) बिल से कहीं खुशी है तो कहीं उम्मीदें नहीं पूरी होने का ग़म.

एक उम्मीद ये थी कि बिल ऐसा हो जिसमें सुलह की नीयत हो और सज़ा की धमकी, और पारिवारिक मामले को आपराधिक न बनाया जाए, क्योंकि अगर आपने शौहर को जेल भेज दिया तो ससुराल वाले तो बीवी को घर पर बैठाकर रोटी खिलाने से रहे.

बिल में तीन तलाक़ देने पर तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है.

साथ ही जेल भेजना तो अदालती प्रक्रिया की शुरुआत है जो महीनों, सालों तक खिंचेगी. ऐसे में पीड़िता की आर्थिक, कानूनी मदद कौन करेगा?

सबा और सना मानती हैं कि बिना पुरुषों में सज़ा का डर जगाए मुस्लिम महिलाओं का भला नहीं होने वाला.

बहस की कई परतें हैं और धार्मिक भावनाओं के कारण मामला संवेदनशील है. इस कारण मुस्लिम महिलाएं भी बंटी हैं.

मुंबई स्थित मजलिस लीगल सेंटर की ऑड्रे डिमेलो की मानें तो नए कानून की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इसे पहले ही नियम-विरुद्ध बता चुकी है.

वो कहती हैं, “इस बिल के पीछे राजनीतिक एजेंडा है. आप चाहते हैं कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति के ख़िलाफ़ शिकायत करे तो उसे गिरफ़्तार किया जाए. इससे महिला को कोई फ़ायदा नहीं होगा.”

“अगर किसी महिला के ख़िलाफ़ पति हिंसा करता है तो वो धारा 498 (ए) के अंतर्गत वो पुलिस की मदद ले सकती हैं.”

धारा 498 ए यानि किसी महिला पर पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता करने की हालत में उसे बचाने के लिए कानून.

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