इजराइल बताएगा भारत को कश्मीर समस्या का हल …!!

14 जून 2000 में तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इसराइल का दौरा किया था, उस समय वे अपने साथ तमाम भारतीय सुरक्षा प्रमुखों को लेकर गए थे. यह एक अभूतपूर्व कदम था. आडवाणी की यात्रा के बाद रूस के आंतरिक मामलों के मंत्री व्लादिमिर रशैलो भी भारत आए.

ध्यान देने वाली बात है कि उस समय इसराइल के चरमपंथ विरोधी विशेषज्ञ रेवेन पेज़ ने कहा था कि वे तमाम देश जो फ़लीस्तीनी ‘फ्रीडम फाइटर्स’ (आज़ादी की मांग करने वाले प्रदर्शनकारी) के ख़िलाफ़ इसराइल की कार्रवाई की निंदा किया करते थे, अब खुद एक कतार में खड़े होकर अपने देशों में पनप रहे ऐसे ही ‘फ्रीडम फाइटर्स’ से निपटने के तरीके इसराइल से सीख रहे हैं.

इसमें कोई शक़ नहीं कि पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराइल यात्रा ने इसराइली दिलों में गहरी छाप छोड़ी और उनकी भारत के प्रति उम्मीदों को भी परवान चढ़ाया.

लेकिन दिसंबर 2017 में जब संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप यरूशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने वाला प्रस्ताव लेकर आए तो भारत ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट किया. भारत के इस कदम से इसराइल को निराशा हुई.

इसराइली समाचार पत्र हारेट्ज़ ने 4 जनवरी को लिखा, ‘भारत इसराइल के साथ गंभीर रिश्ते नहीं चाहता.’

अपने लेख के ज़रिए यह समाचार पत्र ने भारत-इसराइल के द्वपक्षीय संबंधों की सच्चाई समझाने की कोशिश की. लेख के अनुसार, इन दोनों देशों के रिश्ते ‘आकर्षण’ से शुरू होते हुए ‘प्रेम’ तक पहुंचे और अब ‘इसराइल विरोध’ तक आ गए हैं. समाचार पत्र लिखता है कि भारत को अरब और मुस्लिम देशों के साथ अपने रिश्तों में एक तालमेल बनाने की ज़रूरत है. साथ ही भारत में रह रहे मुस्लिम समाज के साथ भी बेहतर सामंजस्य की ज़रूरत है.

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