दुनिया की सबसे बड़ी जन स्वास्थ्य योजना पर संशय..!

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अच्छे अस्पताल कम और ग़रीबों की पहुंच से दूर हैं. इन अस्पतालों में ख़राब प्राथमिक सुविधाएं हैं. निजी अस्पताल और क्लीनिक इतने महंगे हैं कि ग़रीब तबके के लोग इनकी शरण में नहीं जा सकते.

आम बजट में जिस इंश्योरेंस स्कीम का ऐलान हुआ, उसका फायदा 10 करोड़ ग़रीब परिवारों या 50 करोड़ नागरिकों को मिलने की बात कही जा रही है. इसके तहत प्रत्येक परिवार को सालाना पांच लाख रुपये का मेडिकल कवरेज मिलेगा.

तो क्या दुनिया की सबसे बड़ी जन स्वास्थ्य योजना कारगर साबित होगी?

सरकार का अनुमान है कि प्रत्येक परिवार के लिए मेडिकल बीमे का प्रीमियम लगभग 1100 रुपए होगा और इस योजना पर केंद्र सरकार के लगभग 11 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च होंगे. वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक ये दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम होगा.

इस योजना का उद्देश्य भारत के सबसे गरीब 29 प्रतिशत लोगों, जो या तो ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं या निचले-मध्यम तबके से आते हैं, को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना है.

इन लोगों के पास स्थायी नौकरियां नहीं हैं, बहुत कम संपत्ति है और वे ऊंची ब्याज़ दर वाले निजी कर्ज़ों में फंसे हैं. ऊपर से उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख़र्च भी ख़ुद ही उठाना पड़ता है. ऐसे में इस तबके को सरकार की ओर से स्वास्थ्य सेवाएं देना निश्चित तौर पर एक सही दिशा में उठाया गया क़दम है.

भारत के पूर्व स्वास्थ्य सचिव और भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं पर किताब लिखने वाले के सुजाता राव कहते हैं, “हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र को बहुत लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती इस योजना का कार्यान्वयन है.”

वास्तव में यही सबसे बड़ी चिंता भी है.

संघीय स्वास्थ्य सेवा योजनाओं और ऐसी ही जनवित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं- जिन्हें एक दर्जन से अधिक भारतीय राज्यों ने साल 2007 के बाद से लागू किया है और जिनके तहत अस्पताल में भर्ती मरीज़ों की देखभाल की जाती है; का रिकॉर्ड बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा है.

पहले से लागू इन योजनाओं पर किए गए तेरह में से नौ शोधों के मुताबिक इन बीमा योजनाओं के दायरे में आने वाले लोगों के स्वास्थ्य ख़र्चों में किसी तरह की कमी नहीं आई है.

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