स्व स्वप्न झरे फूल से ..लो अब कारवां गुज़र गया

  • बेहतरीन शब्दों की लिखावट और उसके जज़्बातों का मायने होता है कि यदि उसको पढ़ा जाए तो उसको एहसास तो किया जाए किंतु उसको अभिव्यक्त न किया जा सके ।महान कवि एवं लेखक पद्मश्री गोपालदास नीरज कुछ ऐसी ही शख़्सियत थे जिनकी लिखावट देश भर के श्रोता खोजते थे ,ढूंढते थे ,सुनने को आतुर होते थे यहाँ तक की फ़िल्म इंडस्ट्री के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी उनके शब्दों के क़ायल थे । इस महान कवि को देश की ओर से शत शत नमन ।

मैं पीड़ा का राजकुँवर हूँ तुम शहज़ादी रूप नगर की
हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहाँ पर होगा ?

लिखे जो ख़त तुझे
वो तेरी याद में
हज़ारों रंग के
नज़ारे बन गए

ऐ भाई! जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी
दायें ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी
ऐ भाई!

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ

शोखियों में घोला जाये, फूलों का शबाब
उसमें फिर मिलायी जाये, थोड़ी सी शराब
होगा यूँ नशा जो तैयार
हाँ…
होगा यूँ नशा जो तैयार, वो प्यार है

कारवां गुज़र गया –

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।


गोपालदास “नीरज” जी

  • आपको ईश्वर की गोद मे जगह मिले 🙏🙏

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