कैसे मरते-मरते बचे जेट एयर के यात्री जाने ..!!

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हम इंसानों को जीने के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर जाते हैं, हमें ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है.

धरती से ऊपर बढ़ने पर हवा का दबाव भी कम होने लगता है. ऊपर हवा का दबाव कम होने पर ऑक्सीजन के कण बिखरने लगते हैं.

समुद्र तल से 5.5 किलोमीटर ऊपर ऑक्सीजन की मात्रा क़रीब आधी हो जाती है. करीब सात किलोमीटर ऊपर ऑक्सीजन की मात्रा एक-तिहाई रह जाती है.

समुद्र तल से करीब 2.5 किलोमीटर ऊपर उड़ान भरने पर इंसान को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, जैसे सिरदर्द, उल्टी और जी मचलाना.

सभी विमान अंदर से प्रेशर को नियंत्रित रखते हैं ताकि लोग आराम से सांस ले सकें जबकि विमान के बाहर दबाव काफ़ी कम होता है.

विमान में ऑक्सीजन की टंकी नहीं ले जाई सकती इसलिए ऊपर आसमान में मौजूद ऑक्सीजन को विमान के अंदर इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है.

विमान के इंजन से जुड़े टरबाइन बाहर के ऑक्सीजन को कंप्रेस कर अंदर लाते हैं. इंजन से होकर गुज़रने की वजह से हवा का तापमान बहुत अधिक हो जाता है जिसकी वजह से इसे सांस ले पाना मुश्किल होता है.

ऐसे में कूलिंग तकनीक से इसे ठंडा किया जाता है, जिसकी वजह से इसमें आर्द्रता कम होती है.

अगर केबिन में किसी वजह से प्रेशर कम होता है तो सीट के ऊपर एक अतिरिक्त ऑक्सीजन मास्क की व्यवस्था होती है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर यात्री इस्तेमाल कर सकते हैं.

विमान में दो केबिन प्रेशर मशीन होते हैं, जो अंदर में ऑक्सीजन की उपलब्धता को बनाए रखते हैं.

एक बार में एक मशीन मोटर ही काम करती है, जबकि दूसरा इमरजेंसी के लिए होता है. ये दोनों मोटर ऑटोमेटिक होते हैं, जबकि एक मोटर और होता है जो मैनुएली काम करता है.

दोनों ऑटोमेटिक मोटर बंद या ख़राब होने पर तीसरे मोटर का इस्तेमाल किया जाता है.

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