शिक्षा ऐसी हो जो हमें मनुष्य बना सके, जिससे जीवन का निर्माण हो, मानवता का प्रसार हो और चरित्र का गठन हो. -प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

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सुधीर जैन की कलम से  :-

शनिवार को विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में शिक्षा के पारंपरिक लक्ष्य को दोहराया गया. एक ऐसे लक्ष्य को दोहराया गया, जिसे हासिल करने का तरीका सदियों से तलाशा जा रहा है. लक्ष्य यह कि शिक्षा ऐसी हो जो हमें मनुष्य बना सके, जिससे जीवन का निर्माण हो, मानवता का प्रसार हो और चरित्र का गठन हो. प्रधानमंत्री ने ये लक्ष्य विवेकानंद के हवाले से कहे. इस दोहराव में बस वह बात फिर रह गई कि ये लक्ष्य हासिल करने का तरीका क्या हो? प्रधानमंत्री के इस भाषण से उस तरीके के बारे में कोई विशिष्ट सुझाव तो नहीं दिखा, फिर भी उन्होंने निरंतर नवोन्मेष की जरूरत बताई. हालांकि अपनी तरफ से उन्होंने नवोन्मेष को देश दुनिया में संतुलित विकास से जोड़ा. खैर, कुछ भी हो, शिक्षा और ज्ञान की मौजूदा शक्लोसूरत की आलोचना के बहाने से ही सही, कम से कम शिक्षा और ज्ञान के बारे में कुछ सुनने को तो मिला.

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कहां बोले प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री विज्ञान भवन में देश के कुलपतियों और शिक्षा संस्थानों के निदेशकों के एक सम्मेलन में बोल रहे थे. इसका विषय था पुनरुत्थान के लिए शिक्षा पर अकादमिक नेतृत्व. हालांकि इस थीम या विषय को समझने के लिए ऊंचे दर्जे की शिक्षा और ज्ञान की ज़रूरत जान पड़ती है. फिर भी मोटा-मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश, समाज या व्यक्ति के फिर से उत्थान के लिए अकादमिक क्षेत्र को महत्व देने की बात हो रही है. विद्वानों की जमात में अकादमिक का मतलब है कि जो विद्वत्तापूर्ण हो. ग्रीक परंपरा के इस शब्द का उद्भव ही विद्वानों के समागम के रूप में हुआ था. बेशक शनिवार को हुआ यह आयोजन देश के ज्ञान संस्थाओं के कोई 400 प्रशासकों का जमावड़ा था. प्रधानमंत्री उन्हें ही संबोधित कर रहे थे.

 

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