जां निसार अख्तर ने मुझे शायर बनाया …रहत इंदोरी

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एक कपड़ा मिल के मजदूर के घर में जन्मे राहत के शायर बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है. राहत अपने स्कूली दिनों में सड़कों पर साइन बोर्ड लिखने का काम करते थे. उनकी सुंदर लिखावट किसी का भी दिल जीत लेती थी लेकिन तकदीर ने तो उनका शायर बनना मुकर्रर किया हुआ था. एक मुशायरे के दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर जां निसार अख्तर से हुई. बताया जाता है कि ऑटोग्राफ लेते वक्त उन्होंने अपने शायर बनने की तमन्ना जाहिर की. अख्तर साहब ने कहा कि पहले 5 हजार शेर जुबानी याद कर लें फिर अपनी शायरी खुद ब खुद लिखने लगोगे. राहत ने तपाक से जबाव दिया कि 5 हजार शेर तो मुझे याद है. अख्तर साहब ने जवाब दिया- तो फिर देर किस बात की है.

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बस फिर क्या था. राहत साहब इंदौर के आस पास के इलाकों की महफिलों में अपनी शायरी का जलवा बिखेरने लगे और धीरे-धीरे एक ऐसे शायर बन गए जो अपनी बात अपने शेरों के जरिए इस कदर रखते हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन हो जाता है.

राहत साहब की शायरी में जीवन के हर पहलू पर उनकी कलम का जादू देखने को मिलता है. बात चाहे दोस्ती की हो या प्रेम की या फिर रिश्तों की, राहत साहब की कलम जमकर चलती है.

मेरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे, मेरे भाई, मेरे हिस्से की जमीं तू रख ले… कभी दिमाग, कभी दिल, कभी नजर में रहो, ये सब तुम्हारे घर हैं, किसी भी घर में रहो

राहत साहब का यह शेर बताता है कि इंसानी रिश्तों को लेकर वह कितने नाजुक अहसास रखते हैं.

यही नहीं प्रेम को लेकर भी राहत इंदौरी के शेर हमें दूसरी दुनिया में लेकर जाते हैं.

फूंक डालुंगा मैं किसी रोज दिल की दुनिया, ये तेरा खत तो नहीं है जो जला ना सकूं .’

मौजूदा वक्त में अगर किसी ऐसे शायर की बात की जाए जो एक आम हिंदुस्तानी को गहरी से गहरी बात भी बेहद आसान लफ्जों में समझाने का माद्दा रखता है तो लबों पर एक ही नाम आता है. वह नाम है शायर राहत इंदौरी साहब का. तेवर जितने कड़े, भाषा उतनी ही आसान, बात जितनी गंभीर, उसको बयां करने का अंदाज उतना ही खास…लेकिन ऐसा अंदाज जिसे कम समझ के लोग भी आसानी से समझ सकें. ऐसी ही काबिलियत के मालिक हैं राहत इंदौरी.

जीवन का शायद ही ऐसा कोई मसाइल हो जो राहत साहब की शायरी में दिखाई न देता हो. अपनी बात को वह जिस तरह से रखते हैं वह ठीक वैसे ही उनके सुनने वालों के जेहन में समा जाती है. यह उनकी तीखी लेकिन सरल शायरी का ही कमाल है जो उन्हें हर मुशायरे की जान बना देता है. हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान, दुबई हो या अमेरिका हर जगह राहत का बिना डरे अपनी बात को सामने रखना, उन्हें खास बनाता है.

सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

यह शेर बताता है कि राहत साहब अपनी बात किस तरह से ताल ठोककर कहने के आदी हैं.

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