2019 #facebook के लिए मुसीबत भरा हो सकता है ….#

बीते साल हमने फ़ेसबुक पर कई आरोप लगते देखे. हमने सुना और पढ़ा कि फ़ेसबुक अपने यूजर्स का निजी डेटा बेच रहा है.

इस संबंध में फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग को अमरीकी सीनेट के सामने सवाल-जवाब के लिए हाज़िर भी होना पड़ा.

फ़ेसबुक ने भी अपनी ग़लतियां मानी और इन्हें दोबारा न दोहराने के वायदे भी किए. हालांकि तमाम वायदों के बीच लोगों के मन में फ़ेसबुक को लेकर शक़ तो घर कर ही गया.

कुल मिलाकर कहें तो साल 2018 के साथ फ़ेसबुक का लंबे दौर से चला आ रहा अच्छा वक़्त बीत गया.

अब माना जा रहा है कि साल 2019 में उसके बुरे वक़्त की शुरुआत होगी.

फ़ेसबुक पर लग सकता है ज़ुर्माना

माना जा रहा है कि अगले 12 महीनों में फ़ेसबुक पर कड़े ज़ुर्माने लग सकते हैं.

आयरलैंड की डेटा प्रोटेक्शन समिति ने दिसंबर में घोषणा की थी कि वे फ़ेसबुक के ख़िलाफ़ जांच शुरू करने वाले हैं.

इसके अलावा कई देशों ने माना है कि फ़ेसबुक पर उनके नागरिकों का निजी डेटा सुरक्षित नहीं है. फ़ेसबुक के लिए इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं.

इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ़ प्राइवेसी प्रैक्टिशनर्स (आईएपीपी) के निदेशक केट कोलैरी ने कहा है, “हमारा मुख्य उद्देश्य यह है कि इस तरह की गड़बड़ियों को रोकने के लिए सही तरीके अपनाए जाएं. और अगर इतना काफी नहीं हुआ तो हम प्रशासनिक स्तर पर जांच करेंगे.”

दूसरे शब्दों में कहें तो इस समिति का फ़ैसला फ़ेसबुक को काफी महंगा पड़ सकता है.

यूरोपीय संघ के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) ने इस संबंध में कहा है कि अगर कंपनी की ग़लती साबित होती है तो उसकी वैश्विक कमाई का 4 प्रतिशत हिस्सा ज़ुर्माने के तौर पर वसूला जा सकता है.

इस लिहाज़ से देखें तो फ़ेसबुक पर ज़ुर्माने की रकम 150 करोड़ अमरीकी डॉलर से अधिक हो सकती है.

मुश्किलें और भी हैं…

फ़ेसबुक के लिए मुश्किलें यहीं ख़त्म नहीं होने वाली. आयरलैंड में जांच के अलावा अमरीका की फेडेरल ट्रेड समिति (एफ़सीटी) भी साल 2011 में हुए समझौते के आधार पर फ़ेसबुक पर एक जांच कर रही है.

इस समझौते के तहत फ़ेसबुक ने यह वादा किया था कि वह किसी का भी निजी डेटा प्राप्त करने या उसे किसी अन्य के पास साझा करने से पहले उस व्यक्ति की रज़ामंदी ज़रूर लेगा.

फ़ेसबुक ने कई मौकों पर कहा है कि उसने इस समझौते का उल्लंघन नहीं किया. इसके बावजूद एफ़सीटी इस मसले पर और अधिक जांच करना चाहता है.

अगर इस समिति ने अपनी जांच में पाया कि फ़ेसबुक ने समझौते का उल्लंघन किया है तो उस पर बहुत अधिक ज़ुर्माना लग सकता है.

समझौते के अनुसार ऐसा होने पर जितने दिनों तक उल्लंघन हुआ फ़ेसबुक को उसके हिसाब से प्रतिदिन 40 हज़ार अमरीकी डॉलर का ज़ुर्माना भरना होगा.

इतना ही नहीं यह ज़ुर्माना प्रत्येक यूज़र के साथ बढ़ता जाएगा. सिर्फ अमरीका की ही बात की जाए तो वहां फ़ेसबुक पर 8 करोड़ यूजर हैं. इस हिसाब से फ़ेसबुक पर 300 करोड़ अमरीकी डॉलर का ज़ुर्माना लग सकता है.

हालांकि ऐसा होने की संभावनाएं कम ही हैं, क्योंकि एफ़सीटी का मक़सद किसी अमरीकी कंपनी को तबाह करना नहीं है. वह सिर्फ़ उस कंपनी के ग़लत कामों को रोकना चाहते हैं.

वॉशिंगटन पोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में एफ़सीटी के निदेशक डेविड व्लादेक ने कहा था कि फ़ेसबुक पर ज़ुर्माने की रकम 1 अरब डॉलर तक जा सकती है.

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