क्या 2019 के चुनाव में मैं भी हार गया हूं-रविश कुमार

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23 मई 2019 के दिन जब नतीजे आ रहे थे, मेरे व्हाट्स एप पर तीन तरह के मेसेज आ रहे थे। अभी दो तरह के मेसेज की बात करूंगा और आख़िर में तीसरे प्रकार के मेसेज की। बहुत सारे मेसेज ऐसे थे कि आज देखते हैं कि रवीश कुमार की सूजी है या नहीं। उसका चेहरा मुरझाया है या नहीं। एक ने लिखा कि वह रवीश कुमार को ज़लील होते देखना चाहता है। डूब कर मर जाना देखना चाहता है। पंचर बनाते हुए देखना चाहता है। किसी ने पूछा कि बर्नोल की ट्यूब है या भिजवा दें। किसी ने भेजा कि अपने शक्ल की तस्वीर भेज दो ज़रा हम देखना चाहते हैं। मैंने सभी को जीत की शुभकामनाएं दीं। बल्कि लाइव कवरेज़ के दौरान इस तरह के मेसेज का ज़िक्र किया और ख़ुद पर हंसा। दूसरे प्रकार के मेसेज में यह लिखा था कि आज से आप नौकरी की समस्या, किसानों की पीड़ा और पानी की तकलीफ दिखाना बंद कर दीजिए। यह जनता इसी लायक है। बोलना बंद कर दो। क्या आपको नहीं लगता है कि आप भी रिजेक्ट हो गए हैं। आपको विचार करना चाहिए कि क्यों आपकी पत्रकारिता मोदी को नहीं हरा सकी। मैं मुग़ालता नहीं पालता। इस पर भी लिख चुका हूं कि बकरी पाल लें मगर मुग़ालता न पालें।

2019 का जनादेश मेरे ख़िलाफ कैसे आ गया? मैंने जो पांच साल में लिखा बोला है क्या वह भी दांव पर लगा था? जिन लाखों लोगों की पीड़ा हमने दिखाई क्या वह ग़लत थी? मुझे पता था कि नौजवान, किसान और बैंकों में गुलाम की तरह काम करने वाले लोग भाजपा के समर्थक हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी झूठ नहीं बोला। सबने पहले या बाद में यही बोला कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। मैंने इस आधार पर उनकी समस्या को खारिज नहीं किया कि वे नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। बल्कि उनकी समस्या वास्तविक थी इसलिए दिखाई। आज एक सांसद नहीं कह सकता कि उसने पचास हज़ार से अधिक लोगों को नियुक्ति पत्र दिलवाया है। मेरी नौकरी सीरीज़ के कारण दिल्ली से लेकर बिहार तक में लोगों को नियुक्ति पत्र मिला है। कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले। उनमें से बहुतों ने नियुक्ति पत्र मिलने पर माफी मांगी की वे मुझे गालियां देते थे। मेरे पास सैंकड़ों पत्र और मेसेज के स्क्रीन शाट पड़े हैं जिनमें लोगों ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद गाली देने के लिए माफी मांगी है। इनमें से एक भी यह प्रमाण नहीं दे सकता कि मैंने कभी कहा हो कि नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देना। यह ज़रूर कहा कि वोट अपने मन से दें, वोट देने के बाद नागरिक बन जाना।

पचास हज़ार से अधिक नियुक्ति पत्र की कामयाबी वो कामयाबी है जो मैं मोदी समर्थकों के द्वारा ज़लील किए जाने के क्षण में भी सीने पर बैज की तरह लगाए रखूंगा। क्योंकि वे मुझे नहीं उन मोदी समर्थकों को ही ज़लील करेंगे जिन्होंने मुझसे अपनी समस्या के लिए संपर्क किया था। नौकरी सीरीज़ का ही दबाव था कि नरेंद्र मोदी जैसी प्रचंड बहुमत वाली सरकार को रेलवे में लाखों की नौकरियां निकालनी पड़ी। इसे मुद्दा बनवा दिया। वर्ना आप देख लें कि पूरे पांच साल में रेलवे में कितनी वेकेंसी आई और आखिरी साल में कितनी वेकैंसी आई। क्या इसकी मांग गोदी मीडिया कर रहा था या रवीश कुमार कर रहा था? प्राइम टाइम में मैने दिखाया। क्या रेल सीरीज़ के तहत स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन को कुछ समयों के लिए समय पर चलवा देना मोदी का विरोध था? क्या बिहार के कालेजों में तीन साल के बीए में पांच पांच साल से फंसे नौजवानों की बात करना मोदी विरोध था?

इस पांच सालों में मुझे करोड़ों लोगों ने पढ़ा। हज़ारों की संख्या में आकर सुना। टीवी पर देखा। बाहर मिला तो गले लगाया। प्यार दिया।

उसमें नरेंद्र मोदी के समर्थक भी थे। संघ के लोग भी थे और विपक्ष के भी। बीजेपी के लोग भी थे मगर वे चुपचाप बधाई देते थे। मैंने एक चीज़ समझी। मोदी का समर्थक हो या विरोधी वह गोदी मीडिया और पत्रकारिता में फर्क करता है। चूंकि गोदी मीडिया के एंकर मोदी की लोकप्रियता की आड़ में मुझे पर हमला करते हैं इसलिए मोदी का समर्थक चुप हो जाता है। भारत जैसे देश में ईमानदार और नैतिक होने का सामाजिक और संस्थागत ढांचा नहीं है। यहां ईमानदार होने की लड़ाई अकेले की है और हारने की होती है। लोग तंज करते हैं कि कहां गए सत्यवादी रवीश कुमार। कहां गए पत्रकारिता की बात करने वाले रवीश कुमार। मुझमें कमियां हैं। मैं आदर्श नहीं हूं। कभी दावा नहीं किया लेकिन जब आप यह कहते हैं आप उसी पत्रकारिता के मोल को दोहरा रहे होते हैं जिसकी बात मैं कहता हूं या मेरे जैसे कई पत्रकार कहते हैं।

मुझे पता था कि मैं अपने पेशे में हारने की लड़ाई लड़ रहा हूं। इतनी बड़ी सत्ता और कारपोरेट की पूंजी से लड़ने की ताकत सिर्फ गांधी में थी। लेकिन जब लगा कि मेरे जैसे कई पत्रकार स्वतंत्र रूप से कम आमदनी पर पत्रकारिता करने की कोशिश कर रहे हैं तब लगा कि मुझे कुछ ज़्यादा करना चाहिए। मैंने हिन्दी के पाठकों के लिए रोज़ सुबह अंग्रेज़ी से अनुवाद कर मोदी विरोध के लिए नहीं लिखा था बल्कि इस खुशफहमी में लिखा कि हिन्दी का पाठक सक्षम हो। इसमें घंटो लगा दिए। मुझे ठीक ठीक पता था कि मैं यह लंबे समय तक अकेले नहीं कर सकता। मोदी विरोध की सनक नहीं थी। अपने पेश से कुछ ज्यादा प्रेम था इसलिए दांव पर लगा दिया। अपने पेश पर सवाल खड़े करने का एक जोखिम था। अपने लिए रोज़गार के अवसर गंवा देना। फिर भी जीवन में कुछ समय के लिए करके देख लिया। इसका अपना तनाव होता है, जोखिम होता है मगर जो सीखता है वह दुर्लभ है। बटुआ वाले सवाल पूछ कर मैं मोदी समर्थकों के बीच तो छुप सकता हूं लेकिन आप पाठकों के सामने नहीं आ सकता।

मैंने ज़रूर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सबके बीच आकर बोला। आज भी बोलूंगा। आपके भीतर धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह बैठ गया है। आप मशीन बनते जा रहे हैं। मैं फिर से कहता हूं कि धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह से लैस सांप्रदायिकता आपको एक दिन मानव बम में बदल देगी। स्टुडियो में नाचते एंकरों को देख आपको भी लगता होगा कि यह पत्रकारिता नहीं है। बैंकों में ग़ुलाम की तरह काम करने वाली सैंकड़ों महिला अफसरों ने अपने गर्भ गिर जाने से लेकर शौचालय का भय दिखा कर काम कराने का पत्र क्या मुझसे मोदी का विरोध कराने के लिए लिखा था? उनके पत्र आज भी मेरे पास पड़े हैं। मैंने उनकी समस्या को आवाज़ दी और कई बैंक शाखाओं में महिलाओं के लिए अलग से शौचलय बने। मैंने मोदी का एजेंडा नहीं चलाया। वो मेरा काम नहीं था। अगर आप मुझसे यही उम्मीद करते हैं तब भी यही कहूंगा कि एक बार नहीं सौ बार सोच लीजिए।

ज़रूर पत्रकारिता में भी ‘अतीत के गुनाहों की स्मृतियां’ हैं जिसे मोदी वक्त-बेवक्त ज़िंदा करते रहते हैं लेकिन वह भूल जा रहे हैं कि उनके समय की पत्रकारिता का मॉडल अतीत के गुनाहों पर ही आधारित है। मै नहीं मानता कि पत्रकारिता हारी है। पत्रकारिता ख़त्म हो जाएगी वह अलग बात है। जब पत्रकारिता ही नहीं बची है तो फिर आप पत्रकारिता के लिए मेरी ही तरफ क्यों देख रहे हैं। क्या आपने संपूर्ण समाप्ति का संकल्प लिया है। जब मैं अपनी बात करता हूं तो उसमें वे सारे पत्रकारों की भी बातें हैं जो संघर्ष कर रहे हैं। ज़रूर पत्रकारिता संस्थानों में संचित अनैतिक बलों के कारण पत्रकारिता समाप्त हो चुकी है। उसका बचाव एक व्यक्ति नही कर सकता है। ऐसे में हम जैसे लोग क्या ही कर लेंगे।

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