एक इंडिया के भीतर सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्कल और नगालैंड जैसे कितने देश धड़क रहे हैं

अमित शाह विरोधियों को सच्चाई दिखाने के शौक़ीन हैं. वो अक्सर कहते हैं, ”हमने सरकार आपका नहीं, भाजपा का एजेंडा लागू करने के लिए बनाई है जिसके लिए पहले ही चुनाव में जनता की रज़ामंदी ली जा चुकी है.”

हिन्दी थोपने के मसले पर गृहमंत्री बनने के बाद पहली बार ख़ुद उनका ऐसी सच्चाई से सामना हुआ है जिसमें सचमुच का करंट है. नतीजे में उन्हें पलटी मार कर, ख़ुद के गुजराती होने की याद करते हुए क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान की बात करनी पड़ रही है.

इससे पहले छह सालों में भाजपा ने गौमाता, जय श्रीराम, सेना, वंदेमातरम जितने राष्ट्रवादी मुद्दे उठाए उनमें संगठन, सत्ता और मीडिया प्रबंधन से प्रायोजित करंट पैदा किया जा रहा था. हिन्दी का मसला शुद्ध भारतीय हक़ीक़त से टकरा गया है.

हिंदी दिवस पर अमित शाह ने पलटी मारने की जगह नापकर भाषण दिया- “आज ज़रुरत है देश की एक भाषा (हिंदी) हो जिससे विदेशी भाषाओं (अंग्रेज़ी) को जगह न मिले.”

इससे पहले यह कहते हुए- “अनेक भाषाएं, अनेक बोलियां कई लोगों को लगता है कि देश के लिए बोझ हैं लेकिन वे देश की सबसे बड़ी ताक़त हैं” अपने बचाव के लिए जगह बनाई थी. अब इसी जगह में खड़े होकर वे कह रहे हैं कि उनकी बात का ग़लत अर्थ लगाया जा रहा है.

वह कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने की कामयाबी के बाद आरएसएस स्टाइल के राष्ट्रवाद की ओर अगला क़दम उठाने के पहले हिन्दी का सुर्रा छोड़कर देश का मिज़ाज भांपने की कोशिश कर रहे थे.

बात सिर्फ़ इतनी नहीं है कि येदुरप्पा बीजेपी के सबसे आज़ाद मुख्यमंत्री हैं क्योंकि उन्होंने कर्नाटक में जुगाड़ से नई सरकार बनाने में केंद्र से (अ)नैतिक समर्थन के अलावा कोई चीज़ नहीं ली है.

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