वफादार मुसलमान ने बचाई थी महाराणा की जान…

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1576 में महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच यह युद्ध हुआ. अकबर की सेना को मानसिंह लीड कर रहे थे. बताते हैं कि मानसिंह के साथ 10 हजार घुड़सवार और हजारों पैदल सैनिक थे. लेकिन महाराणा प्रताप 3 हजार घुड़सवारों और मुट्ठी भर पैदल सैनिकों के साथ लड़ रहे थे. इस दौरान मानसिंह की सेना की तरफ से महाराणा पर वार किया जिसे, महाराणा के वफादार हकीम खान सूर ने अपने ऊपर ले लिया और उनकी जान बचा ली. उनके कई बहादुर साथी जैसे भामाशाह और झालामान भी इसी युद्ध में महाराणा के प्राण बचाते हुए शहीद हुए थे.

सारी की सारी जनता थी राणा की सेना

राणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ के किले में हुआ था. ये किला दुनिया की सबसे पुरानी पहाड़ियों की रेंज अरावली की एक पहाड़ी पर है. राणा का पालन-पोषण भीलों की कूका जाति ने किया था. भील राणा से बहुत प्यार करते थे. वे ही राणा के आंख-कान थे. जब अकबर की सेना ने कुम्भलगढ़ को घेर लिया तो भीलों ने जमकर लड़ाई की और तीन महीने तक अकबर की सेना को रोके रखा. एक दुर्घटना के चलते किले के पानी का सोर्स गन्दा हो गया. जिसके बाद कुछ दिन के लिए महाराणा को किला छोड़ना पड़ा और अकबर की सेना का वहां कब्ज़ा हो गया. पर अकबर की सेना ज्यादा दिन वहां टिक न सकी और फिर से कुम्भलगढ़ पर महाराणा का अधिकार हो गया. इस बार तो महाराणा ने पड़ोस के और दो राज्य अकबर से छीन लिए.

महाराणा प्रताप की कुल 11 बीवियां थीं और महाराणा की मृत्यु के बाद सबसे बड़ी रानी महारानी अजाब्दे का बेटा अमर सिंह प्रथम राजा बना.

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