जब पत्रकार कुलदीप नैयर लाल बहादुर शास्त्री का संदेश लेकर मोरारजी देसाई के पास गए

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भारत में राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी होना बहुत अच्छा नहीं माना जाता है, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो हरगिज़ नहीं. लेकिन मोरारजी भाई ने प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को कभी नहीं छिपाया.

नेहरू के निधन के बाद मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर लाल बहादुर शास्त्री का संदेश लेकर मोरारजी देसाई के पास गए कि ‘अगर वो जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी में से किसी एक नाम पर सहमत हो जाते हैं, तो मैं प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं लड़ूंगा.’

जब नैयर ने शास्त्री का संदेश मोरारजी देसाई को दिया, तो उन्होंने छूटते ही कहा, “जयप्रकाश नारायण? वो तो संभ्रमित व्यक्ति हैं…और इंदिरा गांधी? दैट चिट ऑफ़ ए गर्ल.”

मोरारजी के बेटे कांति देसाई ने नैयर से कहा, “अपने शास्त्री जी से कहिए कि बैठ जाएं. मोरारजी देसाई को वो हरा नहीं पाएंगे.”

कुलदीप नैयर ने आते ही यूएनआई टिकर पर कहानी की जिसका शीर्षक था, “मोरारजी ने सबसे पहले अपनी टोपी रिंग में फेंकी.”

इस कहानी का असर ये हुआ कि अगले दिन संसद भवन में कामराज ने कुलदीप नैयर के कान में फुसफुसा कर कहा, “थैंक यू.”

शास्त्री ने भी उन्हें फ़ौरन बुलाकर कहा, “अब कोई कहानी लिखने की ज़रूरत नहीं. मुकाबला ख़त्म हो चुका है.”

मोरारजी देसाई ने इसके लिए कुलदीप नैयर को कभी माफ़ नहीं किया.

उन्होंने समझाने की कोशिश की कि इसके लिए उन्हें अपने समर्थकों को दोष देना चाहिए जो नेहरू की अंत्येष्टि के दिन ही लोगों से कहते फिर रहे थे कि प्रधानमंत्री पद उनकी जेब में है.

मोरारजी देसाई की प्रधानमंत्री बनने की इस खुलेआम चाहत ने माहौल उनके ख़िलाफ़ कर दिया और लालबहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बनाए गए.

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