क्यों भाजपा त्रिपुरा जैसे छोटे-से राज्य में विजय को वह ‘विश्वविजय’ की तरह प्रस्तुत कर रही है..!

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त्रिपुरा जैसे छोटे-से राज्य में विजय को वह ‘विश्वविजय’ की तरह प्रस्तुत कर रही है, जश्न मनाने में जुटी है जबकि मेघालय की नाकामी का ज़िक्र तक नहीं हो रहा है.

वह बड़ी चतुराई से ये भी छिपा रही है कि त्रिपुरा और नगालैंड में उसकी कामयाबी का श्रेय उसके सहयोगी दलों को जाता है न कि उसे.

उसने इस स्याह सचाई पर भी परदा डालने में कामयाबी हासिल की है कि पूर्वोत्तर को जीतने के लिए उसने कैसे-कैसे दलों से गठजोड़ किया है.

धन और चुनावी मशीनरी का बेजा इस्तेमाल के आरोप तो अपनी जगह हैं ही, और कांग्रेस भी कभी इन हथकंडों को पूर्वोत्तर भारत में अपनाती रही है.

कहा जा सकता है कि त्रिपुरा की बीजेपी दरअसल बीजेपी है ही नहीं, वह दूसरे दलों के लोगों का जमावड़ा है, बस उस पर बीजेपी का लेबल भर लगा है.

वैसे एक असम को छोड़ दें तो पूरे पूर्वोत्तर का यही हाल है.

हर जगह हेमंत बिश्व सरमा के तोड़-फोड़ से भाजपा ने अपनी राजनीतिक ताक़त खड़ी की है और सत्ता भी हथियाई है.

अरुणाचल प्रदेश का मामला तो पूरी तरह से दल-बदल पर ही आधारित है, मणिपुर पर सत्ता पर काबिज़ होने के लिए भी उसने जो कमाल दिखाया वो लोकतांत्रिक मानदंडों के अनुरूप तो नहीं ही था, वहाँ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी.

राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद का दम भरने वाली बीजेपी ने त्रिपुरा में अगर अलगाववादी संगठनों से हाथ न मिलाया होता तो उसकी वही गत बन सकती थी जो पिछले चुनाव में हुई थी.

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