चर्चिल जिसने जीवन में कभी हार नहीं मानी , जाने उनकी कुछ रोचक बाते …

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सर विस्टन चर्चिल यूनाइटेड किंगडम का एक कुशल राजनीतिज्ञ, आर्मी ऑफिसर , एवं लेखक था,सन १९४० -१९४५ फिर १९५०-१९५५तक वो uk का प्रधानमन्त्री भी रहा हैl

भारतीय इतिहास में उसको पढ़ना काफी रोचक है , इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए जौर्नालिस्ट दिलीप अवस्थी ने अपने अपने पाठको को एक सीरीज प्रस्तुत की है l

बहुत कम लोगो को पता होगा कि चर्चिल एक मात्र राजनीतिज्ञ था जिसको नोबल पुरूस्कार मिला, और दूसरा विश्वयुद्ध का सेहरा उसके सिर पर बाँधा गया lदि स्टोरी ऑव मालकंड फील्ड फोर्स (१८९८) और दि रिवर वार (१८९९)  ‘लंदन टु लेडीस्मिथ वाया प्रिटोरिया’ (१९००) चर्चिल के द्वारा लिखी पुस्तके है, जिसमे उन्होंने युद्ध के दौरान हुई घटनाओं का उल्लेख किया हैl

अपने लाभ के लिए अंग्रेजों ने ब्रिटिश लोगों ने भारत में मानव इतिहास का भयंकरतम नरसंहार किया और इसके करने वाला कोई और नहीं वरन तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टल चर्चिल था। भारतीयों की मौतों पर उसका कहना था कि ‘मैं भारतीयों से घृणा करता हूं। वे जानवरों जैसे लोग हैं जिनका धर्म भी पशुओं जैसा है। अकाल उनकी अपनी ही गलती थी क्योंकि खरगोशों की तरह जनसंख्या बढ़ाने का काम करते रहे।’
जब भारत में अपना कामकाज करने की बात आती है तो इस मामले में अंग्रेजों का आर्थिक एजेंडा पूरी तरह से कट्‍टर था जिसमें भारतीयों के लिए दयाभाव की कोई गुंजाइश नहीं थी। ब्रिटिश शासन में भारत ने अनगिनत अकालों को झेला, लेकिन सबसे ज्यादा दर्दनाक और भयानक बंगाल का अकाल था।
इस तरह का पहला अकाल 1770 में पड़ा था। और इसके बाद 1783, 1866, 1873, 1892, 1897 और अंत में 1943-44 में अकाल पड़ा। पहले तो ऐसा होता था कि जब अकाल पड़ता तो देश में शासन करने वाले लोग इन बड़ी त्रासदियों को कम करने के लिए उपयोगी कदम उठाते थे, लेकिन जब अंग्रेज आए तो अकाल मानसून की देरी के साथ-साथ केवल ब्रिटिश लोगों के लाभ के लिए देश के प्राकृतिक संसाधनों के भीषण शोषण का नतीजा था। लेकिन इसके बावजूद ब्रिटिश सत्ताधीशों ने कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं किया कि उनकी कारगुजारियों के कारण भारतीयों को किन भयानक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद वे इस बात को लेकर क्रोधित होते थे कि अकाल के कारण उन्हें पर्याप्त टैक्स नहीं मिल पा रहा है।
इनमें से पहला अकाल 1770 में पड़ा था और यह भयानक रूप से विकराल और नृशंस था। इस तरह के भयानक अकाल पड़ने के चिन्ह 1769 में दिखाई देने लगे थे और इस अकाल का असर 1773 तक बना रहा। इस अकाल में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत हो गई। यह संख्या उससे भी लाखों की संख्या में ज्यादा थी जितनी संख्या में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों को जेलों में डाला गया था।

इस अकाल के चलते बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या का सफाया हो गया था। अपनी पुस्तक ‘द अनसीन वर्ल्ड’ में अमेरिकी इतिहासकार और दार्शनिक जॉन फिस्क ने लिखा है कि 1770 में बंगाल का अकाल उस ब्लैक प्लेग की तुलना में कहीं अधिक भयानक था जिसने चौदहवीं सदी में समूचे यूरोप को आतंकित कर दिया था।

 

 

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