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स्वास्थ्य के लिए अच्छा खाना क्या है और स्वस्थ भोजन के फायदे क्या-क्या हैं।

खाना’ शरीर की मूलभूत जरूरत से अलग अब लोगों के मन को तृप्त करने वाली चीज बन चुका है। कुछ लोग भूख लगने पर खाते हैं, जबकि कुछ लोग सिर्फ भोजन को चखने के लिए खाते हैं। हालांकि, इन सबके बीच अगर आपसे पूछा जाए कि क्या आप पौष्टिक आहार का सेवन करते हैं, तो हो सकता है कि आप थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ जाएं। यह एक गंभीर विषय है, इसलिए बेहतर स्वास्थ्य के लिए इस पर विचार करना जरूरी है।

              मॉडल एवं एक्ट्रेस मेघना कहती है, हेल्थ के लिए proper diet schedule होना जरूरी है , आज कल के stressful life में आपकी थोड़ी सी लापरवाही बहुत सारी हेल्थ इशू क्रिएट कर सकता है l

आइए जानते हैं स्वास्थ्य के लिए अच्छा खाना क्या है और स्वस्थ भोजन के फायदे क्या-क्या हैं।

शुरुआत इस सवाल से करते हैं कि स्वस्थ आहार क्या है? आप में से कई लोगों के मन में यह दुविधा चलती होगी कि आज के वक्त में स्वस्थ भोजन जैसी चीज न के बराबर है और अगर है भी, तो वो शायद स्वाद में अच्छी न लगे। इसलिए, नीचे हम आपको स्वस्थ आहार के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं।स्वस्थ आहार का मतलब ऐसे खाद्य पदार्थों से है, जो विटामिन, मिनरल, आयरन, प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। आहार जो आपको सेहतमंद और तंदुरुस्त रखने का काम करें और आपको बीमारियों से दूर रखें। स्वस्थ आहार को पांच श्रेणी में बांटा जा सकता है l

  • हरी सब्जियां और फलियां
  • फल
  • मीट-मछली, पोल्ट्री उत्पाद
  • अनाज
  • दूध उत्पाद जैसे – पनीर, दही

वस्थ आहार के फायदे अनेक हैं जिन्हें हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से जान सकते हैं –

  • स्वस्थ भोजन करने से न सिर्फ आपका शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि आपका दिमाग भी तेज होता है।
  • स्वास्थ्य के लिए अच्छा खाना खाने से शरीर मजबूत होता है।
  • स्वस्थ आहार हड्डियों को मजबूत रखते हैं।
  • पौष्टिक भोजन गर्भावस्था के दौरान एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
  • हरी-सब्जियां और फल मोटापा, कैंसर, डायबिटीज, ह्रदय रोग जैसी गंभीर शारीरिक समस्याओं से बचाव करते हैं।। खासकर वो खाद्य पदार्थ जिसमें फ़ाइबर की अधिक मात्रा होती है ।

पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थ के सेवन से किडनी स्टोन और ब्लड प्रेशर का खतरा कम हो सकता ह।

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जाने …….यदि आप किसी बिमारी से ग्रसित है तो मिल सकती है इनकम टैक्स में छूट…!

इनकम टैक्सल डिपार्टमेंट कई ऐसी बीमारियों के इलाज पर टैक्स छूट रहा है जिससे आप बीमारी पर हुए खर्च के लिए क्लेम कर सकते हैं.

आयकर कानून के कई प्रावधान हैं जिनमें टैक्स छूट का लाभ मिलता है. सेक्शन 80सी के बारे में आपने काफी कुछ पढ़ा-सुना होगा. पर, क्या आप जानते हैं कि खास बीमारियों के इलाज पर किए गए खर्च पर भी डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है? इसका लाभ सेक्शन 80डीडीबी के तहत मिलता है. खुद या परिवार के आश्रित सदस्य के चिकित्सा खर्च पर यह डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है.

कोई भी खुद या परिवार के आश्र‍ित सदस्य पर किए गए ऐसे खर्च के ल‍िए डिडक्शन क्लेम कर सकता है. इन सदस्यों में जीवनसाथी, माता-पिता, बच्चे या आश्रित भाई-बहन शामिल हो सकते हैं. हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के मामले में यह परिवार का कोई सदस्य हो सकता है.

3. डिडक्शन की रकम कई बातों पर निर्भर करती है. इसमें देखा जाता है कि आश्रित व्यक्ति की उम्र कितनी है. वास्तविक रकम कितनी खर्च हुई है? क्या यह 1 लाख रुपये है? इनमें जो भी रकम कम होगी डिडक्शन का फायदा उसके लिए ही मिलेगा. 60 साल से कम उम्र के लोगों के लिए डिडक्शन की रकम 40,000 रुपये तक सीमित है. यदि बीमार व्यक्ति की उम्र 60 साल से ज्यादा है तो एक लाख रुपये तक का डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है.

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जाने क्या है स्वस्थ जीवन जीने के उपाय…..!!!

 1. तांबे के बर्तन का पानी पीयें

तांबे के बैक्टीरिया-नाशक गुणों में मेडिकल साईंस बड़ी गहरी रुचि ले रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रयोग हुए हैं और वैज्ञानिकों ने यह मालूम किया है कि पानी की अपनी याददाश्त होती है – यह हर उस चीज को याद रखता है जिसको यह छूता है। पानी की अपनी स्मरण-शक्ति होने के कारण हम इस बात पर ध्यान देते हैं कि उसको कैसे बर्तन में रखें। अगर आप पानी को रात भर या कम-से-कम चार घंटे तक तांबे के बर्तन में रखें तो यह तांबे के कुछ गुणअपने में समा लेता है।

 

यह पानी खास तौर पर आपके लीवर के लिए और आम तौर पर आपकी सेहत और शक्ति-स्फूर्ति के लिए उत्तम होता है। अगर पानी बड़ी तेजी के साथ पंप हो कर अनगिनत मोड़ों के चक्कर लगाकर लोहे या प्लास्टिक की पाइप के सहारे आपके घर तक पहुंचता है तो इन सब मोड़ों से रगड़ाते-टकराते गुजरने के कारण उसमें काफ़ी दोष आ जाता है। लेकिनपानी में याद्दाश्त के साथ-साथ अपने मूल रूप में वापस पहुंच पाने की शक्ति भी होती है। अगर आप नल के इस पानी को एक घंटे तक बिना हिलाये-डुलाये रख देते हैं तो दोष अपने-आप खत्म हो जाता है।

हो सकते हैं जिंदगी भर के लिए पैरालाइज्ड..!!!

 शरीर को नींद नहीं, आराम दें

आप सोने किस वक्त जाते हैं, यह तो आपके लाइफ स्टाइल पर निर्भर करता है, लेकिन महत्व इस बात का है कि आपको कितने घंटे की नींद की जरूरत है। अकसर कहा जाता है कि दिन में आठ घंटे की नींद लेनी ही चाहिए। आपके शरीर को जिस चीज की जरूरत है, वह नींद नहीं है, वह आराम है। अगर आप पूरे दिन अपने शरीर को आराम दें, अगर आपका काम, आपकी एक्सरसाइज सब कुछ आपके लिए एक आराम की तरह हैं तो अपने आप ही आपकी नींद के घंटे कम हो जाएंगे। लोग हर चीज तनाव में करना चाहते हैं। मैंने देखा है कि लोग पार्क में टहलते वक्त भी तनाव में होते हैं। अब इस तरह का व्यायाम तो आपको फायदे की बजाय नुकसान ही करेगा, क्योंकि आप हर चीज को इस तरह से ले रहे हैं जैसे कोई जंग लड़ रहे हों। आप आराम के साथ क्यों नहीं टहलते? चाहे टहलना हो या जॉगिंग, उसे पूरी मस्ती और आराम के साथ क्यों नहीं कर सकते?

तो सवाल घूमफिर कर वही आता है कि मेरे शरीर को कितनी नींद की जरूरत है? यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस तरह का शारीरिक श्रम करते हैं। आपको न तो भोजन की मात्रा तय करने की जरूरत है और न ही नींद के घंटे। मुझे इतनी कैलरी ही लेनी है, मुझे इतने घंटे की नींद ही लेनी है, जीवन जीने के लिए ये सब बेकार की बातें हैं। आज आप जो शारीरिक श्रम कर रहे हैं, उसका स्तर कम है, तो आप कम खाएं। कल अगर आपको ज्यादा काम करना है तो आप ज्यादा खाएं। नींद के साथ भी ऐसा ही है। जिस वक्त आपके शरीर को पूरा आराम मिल जाएगा, यह उठ जाएगा चाहे सुबह के 3 बजे हों या 8। आपका शरीर अलार्म की घंटी बजने पर नहीं उठना चाहिए। एक बार अगर शरीर आराम कर ले तो उसे खुद ही जग जाना चाहिए।

 दो हफ्ते में एक बार उपवास करें

आप शरीर के प्राकृतिक चक्र से जुड़ा ‘मंडल’ नाम की एक चीज होती है। मंडल का मतलब है कि हर 40 से 48 दिनों में शरीर एक खास चक्र से गुजरता है।

हर चक्र में तीन दिन ऐसे होते हैं जिनमें आपके शरीर को भोजन की आवश्यकता नहीं होती। अगर आप अपने शरीर को लेकर सजग हो जाएंगे तो आपको खुद भी इस बात का अहसास हो जाएगा कि इन दिनों में शरीर को भोजन की जरूरत नहीं होती। इनमें से किसी भी एक दिन आप बिना भोजन के आराम से रह सकते हैं।

11 से 14 दिनों में एक दिन ऐसा भी आता है, जब आपका कुछ भी खाने का मन नहीं करेगा। उस दिन आपको नहीं खाना चाहिए। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि कुत्ते और बिल्लियों के अंदर भी इतनी सजगता होती है। कभी गौर से देखें, किसी खास दिन वे कुछ भी नहीं खाते। दरअसल, अपने सिस्टम के प्रति वे पूरी तरह सजग होते हैं। जिस दिन सिस्टम कहता है कि आज खाना नहीं चाहिए, वह दिन उनके लिए शरीर की सफाई का दिन बन जाता है और उस दिन वे कुछ भी नहीं खाते। अब आपके भीतर तो इतनी जागरूकता नहीं कि आप उन खास दिनों को पहचान सकें। फिर क्या किया जाए! बस इस समस्या के समाधान के लिए अपने यहां एकादशी का दिन तय कर दिया गया। हिंदी महीनों के हिसाब से देखें तो हर 14 दिनों में एक बार एकादशी आती है। इसका मतलब हुआ कि हर 14 दिनों में आप एक दिन बिना खाए रह सकते हैं। अगर आप बिना कुछ खाए रह ही नहीं सकते या आपका कामकाज ऐसा है, जिसके चलते भूखा रहना आपके वश में नहीं और भूखे रहने के लिए जिस साधना की जरूरत होती है, वह भी आपके पास नहीं है, तो आप फलाहार ले सकते  हैं। कुल मिलाकर बात इतनी है कि बस अपने सिस्टम के प्रति जागरूक हो जाएं।

एक बात और, अगर आप बार-बार चाय और कॉफ़ी पीने के आदी हैं और उपवास रखने की कोशिश करते हैं तो आपको बहुत ज्यादा दिक्कत होगी। इस समस्या का तो एक ही हल है। अगर आप उपवास रखना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने खानपान की आदतों को सुधारें। पहले सही तरह का खाना खाने की आदत डालें, तब उपवास की सोचें। अगर खाने की अपनी इच्छा को आप जबर्दस्ती रोकने की कोशिश करेंगे तो यह आपके शरीर को हानि पहुंचाएगा। यहां एक बात और बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी भी हाल में जबर्दस्ती न की जाए।

 पीठ को सीधा रखकर बैठें

शरीर के भीतरी अंगों के आराम में होने का खास महत्व है। इसके कई पहलू हैं। फिलहाल हम इसके सिर्फ एक पहलू पर विचार कर रहे हैं। शरीर के ज्यादातर महत्वपूर्ण भीतरी अंग छाती और पेट के हिस्से में होते हैं। ये सारे अंग न तो सख्त या कड़े होते हैं और न ही ये नट या बोल्ट से किसी एक जगह पर स्थिर किए गए हैं। ये सारे अंग ढीले-ढाले और एक जाली के अंदर झूल रहे से होते हैं। इन अंगों को सबसे ज्यादा आराम तभी मिल सकता है, जब आप अपनी रीढ़ को सीधा रखकर बैठने की आदत डालें।

पीठ को सीधा रखें

आधुनिक विचारों के मुताबिक, आराम का मतलब पीछे टेक लगाकर या झुककर बैठना होता है। लेकिन इस तरह बैठने से शरीर के अंगों को कभी आराम नहीं मिल पाता। इस स्थिति में, शारीरिक अंग उतने ठीक ढंग से काम नहीं कर पाते जितना उनको करना चाहिए – खासकर जब आप भरपेट खाना खाने के बाद आरामकुर्सी पर बैठ जाएं। आजकल काफी यात्राएं आराम कुर्सी में होती हैं। अगर आप कार की आरामदायक सीट पर बैठकर एक हजार किलोमीटर की यात्रा करते हैं, तो आप अपने जीवन के कम-से-कम तीन से पांच माह खो देते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लगातार ऐसी मुद्रा में बैठे रहने की वजह से आपके अंगों पर इतना बुरा असर होता है कि उनके काम करने की शक्ति में नाटकीय ढंग से कमी आ जाती है या फि र वे बहुत कमजोर हो जाते हैं।

शरीर को सीधा रखने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमें आराम पसंद नहीं है, बल्कि इसकी सीधी सी वजह यह है कि हम आराम को बिल्कुल अलग ढंग से समझते और महसूस करते हैं। आप अपनी रीढ़ को सीधा रखते हुए भी अपनी मांसपेशियों को आराम में रहने की आदत डाल सकते हैं। लेकिन इसके विपरीत, जब आपकी मांसपेशियां झुकीं हों, तो आप अपने अंगों को आराम में नहीं रख सकते। आराम देने का कोई और तरीका नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने शरीर को इस तरह तैयार करें कि रीढ़ को सीधा रखते हुए हमारे शरीर का ढांचा और स्नायुतंत्र आराम की स्थिति में बने रहें।

 पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें

हम कुछ लोगों को बता रहे थे कि हमारे योग केंद्र में एक योगिक अस्पताल है, तो अमेरिका से कुछ डॉक्टर इसे देखना चाहते थे और वे हमारे यहां आए। वे एक हफ्ते यहां थे और एक हफ्ते के बाद वे मुझसे बहुत नाराज़ थे। मैंने कहा – “क्यों, मैंने क्या किया? वे चारों तरफ यही बातें कर रहे थे – “ये सब फ़ालतू बकवास है! सद्गुरु ने कहा यहां एक योगिक अस्पताल! कहां है योगिक अस्पताल? हमें कोई बिस्तर नहीं दिख रहे हैं, हमें कुछ नहीं दिख रहा”। फिर मुझे समझ आया कि उनकी समस्या क्या है, फिर मैंने उन्हें बुलाया और मैंने कहा – “परेशानी क्या है” उनमें से एक महिला, जिनकी आँखों में आंसू थे, बोलीं – मैं यहां इतने विश्वास के साथ आई और यहां धोखा हो रहा है, यहां कोई अस्पताल नहीं है, बिल्कुल भी कुछ नहीं यहां और आप बोल रहे हैं कि यहां अस्पताल है। मैंने कहा – “आराम से बैठिये। आपके अस्पताल के बारे में ये विचार हैं कि – बहुत से बिस्तर हों जहां मरीजों को सुला दो और उन्हें दवाइयां देते रहो – ये अस्पताल ऐसा नहीं है। मैं आपको आस-पास घुमाता हूँ – सभी मरीज़ यहां बगीचे में काम कर रहे हैं, और रसोई घर में काम कर रहे हैं। हम उनसे काम करवाते हैं, और वे ठीक हो जाते हैं।

तो, सबसे महत्वपूर्ण चीज़ ये है कि अगर कोई बीमार हो तो हम उनसे बगीचे में काम करवाते हैं। उन्हें खाली हाथों धरती के संपर्क में कम से कम आधे घंटे से लेकर 45 मिनट तक जरुर होना होता है। ऐसा करने से वे स्वस्थ हो जाते हैं। क्योकि आप जिस चीज़ को शरीर कहते हैं वो बस इस धरती का एक टुकडा है, है न? हां या ना? वे सभी अनगिनत लोग जो इस धरती पर चले, वे सब कहां गए? सब धरती की उपरी सतह पर हैं, है न? ये शरीर भी धरती की सतह पर चला जाएगा – जब तक कि आपके दोस्त – इस डर से कि आप फिर से न जाग जाएं – आपको बहुत गहरा न दफना दें। तो, यह बस धरती का एक टुकड़ा है। तो यह अपने सर्वोत्तम रूप में तब रहेगा, जब आप धरती से थोडा संपर्क बनाकर रखें। फिलहाल आप हर वक़्त सूट और बूट पहन कर पचासवें फ्लोर पर चलते रहते हैं, और कभी भी धरती के संपर्क में नहीं आते। ऐसे में आपका शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार होना स्वाभाविक है। फिर मैंने उन्हें दिखाया – “देखो इस व्यक्ति को दिल का रोग है, उस व्यक्ति को वो बीमारी है। मैंने सभी मरीजों से उनका परिचय कराया और फिर मरीज़ अपनी बातें बताने लगे – “तीन हफ्ते पहले हम ऐसे थे, और अब हमें बहुत अच्छा लग रहा है, हम अपनी बीमारी ही भूल गए हैं।” और अब सभी मेडिकल मापदंड भी कह रहे हैं कि वे ठीक हैं। अमेरिकी डॉक्टर को यह विश्वास दिलाने में कि ये लोग सच में मरीज़ हैं हमें बहुत मेहनत करनी पड़ी। हम उन्हें अच्छे काम में भी लगा रहे हैं।

 

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मस्त जिन्दगी जीने के लिए रखें ये ध्यान …..!!!!

Healthy जिन्दगी हर किसी के लिए सबसे पहली ख्वाहिश में से एक होती है लेकिन समस्या ये है कि सब कुछ जानते हुए भी हम वो नहीं करते है जो हमे अपनी इस इच्छा के करीब लेके जाएँ और हमे पता भी होता है कि किस तरह का  lifestyle या किस तरह का खाना हमारी health को खराब कर रहा है लेकिन उसके बाद भी जब हम अपने बारे में सही से नहीं सोच पाते है तो health से जुडी advises भी आपके लिए फीकी होतीं है तो चलिए जानते है कैसे हम कुछ चीज़े avoid करते हुए अपनी health के लिए जिम्मेदारी से ख्याल रख सकते है और इसी से जुड़े कुछ basic tips और tricks हम जानते है जो हमारे खाने की आदतों से जुड़े है |

सबसे पहले जो बात आती है वो है खुद पर control करने की और खाने से जुडी आदतों को सही करने की क्योंकि जब तक आप खुद को संयमित नहीं कर लेते है तब तक आप कितना भी healthy food क्यों न खाएं चीज़े आपके लिए नहीं बदलेंगी |

  • उसके बाद सबसे पहले आता है आप fast food को avoid करना शुरू करें क्योंकि हो सकता है आपके लिए fast food समय बचाने और मज़बूरी में पेट भरने का एक अच्छा जरिया है लेकिन फिर भी बहुत सारी ऐसी वजहें है जो आपको जाननी चाहिए और जिन्हें जानने के बाद आप निश्चित रूप से fast food खाने के बारे में सोचना भी बंद कर देंगे |
  • alcohol चाहे थोड़ी मात्रा में आप लें या फिर इसका सेवन आदतन तौर पर करें लेकिन यह जाहिर है कि आपके शरीर के लिए और lever के लिए इस से हानिकारण दूसरी कोई और चीज़ नहीं है | लोग इसे तनाव से बचने के बहाने के तौर पर पीते है लेकिन यह एक बचकाना जवाब है |
  • cigarettes का सेवन न केवल health view से आपके लिए हानिकारक है बल्कि सामाजिक तौर पर भी यह आपकी छवि को खराब करता है हालाँकि ये अलग बात है कि आपको इसके side effect पता होने के बाद भी इसे छोड़ देना खुद के साथ महाभारत के युद्ध लड़ने के समान ही होता है लेकिन अगर आप अपनी health के लिए वाकई में जागरूक है तो दृढ संकल्प के साथ आप इसे छोड़ भी सकते है | साथ ही इसके side effect जग जाहिर है और आपको कुछ समय में ही इसका आभास हो जाता है जब आप साँस से जुडी health problems को face करने लगते है |

हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है एक गिलास दूध…!!!!

  • healthy food की अगर बात करें तो आप बादाम और काजू आदि dryfruits का बड़े आराम से जितना हो सके अधिक सेवन कर सकते है क्योंकि बादाम आदि के फायदे न केवल शारीरिक है अपितु मानसिक भी है |
  • खुद को hydrated रखने के लिए आप ग्रीन टी का नियमित सेवन कर सकते है |
  • खुद को healthy और फ्रेश फील करवाने के लिए आप अधिक से अधिक पानी का सेवन करें क्योंकि पानी जीवन हमारे body के लिए ऐसा आवश्यक तरल है जिसके बिना और कमी के शरीर की कोई भी क्रिया सहज रूप से नहीं हो सकती है और जितना अधिक आप पानी पीते है उतना ही आपके शरीर के अवांछित पदार्थो के मूत्र मार्ग और पसीने के माध्यम से निकलने की दर बढती जाती है |
  • strawberry, banana, blackberries आदि फलों का juice का सेवन अधिकाधिक तौर पर करें क्योंकि इनका सेवन आपके health के लिए कमाल का होता है |

 

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ये ख़ास आदते जो बताती है कि आप बूढ़े हो रहे हो ..जानने के लिए पढ़े ..!!

1. डीएनए की क्षति

हमारा डीएनए एक तरह का जेनेटिक कोड होता है जो कोशिकाओं के बीच संचरित होता है.

उम्र बढ़ने से इन जेनेटिक कोड के संचरण में गड़बड़ी होनी शुरू हो जाती है.

धीरे-धीरे यह कोशिकाओं में जमा होना शुरू हो जाती हैं.

इस प्रक्रिया को आनुवांशिक अस्थिरता के रूप में जाना जाता है और यह विशेष रूप से तब प्रासंगिक होता है जब डीएनए स्टेम कोशिकाओं को प्रभावित करता है.

आनुवांशिक अस्थिरता स्टेम कोशिकाओं की भूमिका को ख़तरे में डाल सकती है.

अगर ये अथिरता बढ़ जाती है तो यह कैंसर में भी तब्दील हो सकती है.

2. क्रोमोसोम्स का कमज़ोर होना

हर डीएनए सूत्र के अंतिम छोर पर कैप जैसी संरचना होती है जो हमारे क्रोमोसोम्स को सुरक्षित रखते हैं- ये बिल्कुल वैसी ही संरचना होती है, जैसे हमारे जूतों के फीतों की, जिसमें फीते के अंतिम छोर पर एक प्लास्टिक का टिप लगा होता है.

इन्हें टेलोमर्स कहते हैं. हम जैसे-जैसे उम्रदराज़ होते जाते हैं, ये कैप रूपी संरचना हटने लगती है और क्रोमोसोम की सुरक्षा ढीली पड़ने लगती है.

इस वजह से परेशानी पैदा हो सकती है.

शोधकर्ता मानते हैं कि टेलोमर्स की संरचना में जब गड़बड़ी आती है तो कई बीमारियां होने का ख़तरा बढ़ जाता है. इसकी वजह से फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं और एनीमिया होने का ख़तरा बढ़ जाता है. ये दोनों ही रोग प्रतिरक्षा से जुड़ी गंभीर समस्याएं हैं.

 

3. कोशिकाओं का व्यवहार प्रभावित होता है

हमारे शरीर में एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया होती है जिसे डीएनए एक्सप्रेशन कहते हैं, जिसमें किसी एक कोशिका में मौजूद हज़ारों जीन्स ये तय करते हैं कि उस कोशिका को क्या करना है .

मसलन, क्या उस कोशिका को त्वचा वाली कोशिका के तौर पर काम करना है या मस्तिष्क कोशिका के रूप में.

लेकिन समय और जीवनशैली इन निर्देशों को बदल सकते हैं. ऐसे में कोशिकाएं भी अपने तय व्यवहार से अलग तरीक़े से व्यवहार कर सकती हैं.

4. कोशिकाओं के नवीनीकरण की क्षमता ख़त्म हो जाती है

हमारी कोशिकाओं में क्षतिग्रस्त घटकों के संचय को रोकने के लिए शरीर में नवीनीकरण की क्षमता होती है.

लेकिन बढ़ती उम्र के साथ ही ये क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है.

ऐसे में कोशिकाएं बेकार या ज़हरीले प्रोटीन जमा करने लगती हैं- जो कई बार अल्ज़ाइमर का कारण बन जाता है. कई बार इसकी वजह से पार्किन्संस और मोतियाबिंद का ख़तरा भी बढ़ जाता है.

5. कोशिकाएं मेटाबॉलिज़्म कंट्रोल खो देती हैं

बढ़ती उम्र के साथ कोशिकाएं वसा और शक्कर के तत्व को सोखने की क्षमता खोती जाती हैं.

इसके चलते बहुत बार मधुमेह की शिकायत हो जाती है. बढ़ती उम्र में जिन लोगों को मधुमेह की शिकायत होती है उन लोगों में विशेष रूप से यही कारण होता है- उम्रदराज़ शरीर उन सभी पोषक तत्वों को ग्रहण नहीं कर पाता है जो वो खाता है.

६.स्टेम सेल अपनी क्षमता खोने लगती हैं

उम्र बढ़ने के साथ कोशिकाओं की पुनरुत्पादक क्षमता में कमी आ जाती है.

स्टेम कोशिकाएं थकने लगती हैं. हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि स्टेम कोशिकाओं के कायाकल्प से बढ़ती उम्र के शारीरिक लक्षणों को सामने आने से रोका जा सकता है.

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जाने ‘चेक प्वाइंट थेरेपी’ कैंसर का प्रभावी इलाज़ जिसके लिए प्रोफ़ेसर एलिसन एवं प्रोफ़ेसर हॉन्ज़ो को मिला नोबल पुरूस्कार ..

मानव शरीर के इम्यून सिस्टम का इस्तेमाल कर कैंसर को निष्प्रभावी बनाने के लिए एक नया इलाज निकाला है दो वैज्ञानिकों ने.

इन दोनों को इसके लिए इस साल का फ़िज़ियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार मिला है.

अमरीका के प्रोफ़ेसर जेम्स पी एलिसन और जापान के प्रोफ़ेसर तासुकू हॉन्ज़ो ने ये काम किया है. उनके इस इलाज को ‘चेक प्वाइंट थेरेपी’ कहा जा रहा है.

पुरस्कार देने वाले स्वीडिश अकेडमी ने बताया कि इम्यून चेक प्वाइंट थेरेपी कैंसर के उपचार में काफ़ी क्रांतिकारी बदलाव किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये “काफ़ी प्रभावी” साबित हुआ है.

टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एलिसन और क्योटो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हॉन्ज़ो नोबेल पुरस्कार से मिलने वाली राशि को साझा करेंगे, जो नौ मिलियन स्वीडिश क्रोनर यानि लगभग 1.01 मिलियन डॉलर या लगभग 7.40 करोड़ रुपये है.

पुरस्कार स्वीकार करते हुए तासुकू हॉन्ज़ो ने संवाददाताओं से कहा, “मैं अपना शोध जारी रखना चाहता हूं… ताकि ये इम्यून थेरेपी अधिक से अधिक कैंसर के मरीजों को बचा सके.”

प्रोफ़ेसर एलिसन ने कहा, “ये काफ़ी अच्छा है, इम्यून चेक प्वाइंट ब्लॉकेड से पूरी तरह सही होने वाले मरीजों से मिलने का भी मौका है. वे मूलभूत विज्ञान की शक्ति साबित करने के लिए हैं ताकि चीज़ें कैसे काम करती है, ये हम सीख और समझ सकें और उन्हें बता सकें.”

लाइलाज बीमारी का इलाज

हमारा इम्यून सिस्टम हमें कई बीमरियों से बचाता है लेकिन अंदर ये अपने ही ऊतकों के हमले से बचने के लिए एक सेफ़गार्ड भी बनाता है.

कुछ कैंसर उन “ब्रेक्स” का फ़ायदा उठा सकते हैं और हमले से बच सकते हैं.

70 के दशक में एलिसन और हॉन्ज़ो ने ब्रेक लगाने वाले प्रोटीन को बंद करके ट्यूमर पर हमला करने वाले हमारे इम्यून सिस्टम को हटाने के लिए एक रास्ता ढूंढ़ निकाला है.

जिस बीमारी का पहले इलाज होना नामुमकिन था उसके लिए नई दवाईयां लाई गई, जो मरीजों को इस बीमारी से लड़ने के लिए एक नई उम्मीद देगा.

इम्यून थेरेपी चेक प्वाइंट का उपयोग एनएचएस द्वारा किया गया है. जिसका इस्तेमाल गंभीर मेलानोमा (त्वचा कैंसर) के इलाज के लिए किया जा रहा है.

ये सबके लिए प्रभावी नहीं है लेकिन कुछ मरीज़ों में बहुत ही अच्छी तरह काम कर रहा है जिसके परिणाम अविश्वसनीय है. पूरी तरह से ट्यूमर से छुटकारा मिल रहा है चाहे वो शरीर में पूरी तरह ही क्यों न फैल गया हो.

ऐसे मरीज़ों में इतने अच्छे परिणाम पहले कभी नहीं देखे गए हैं. एडवांस लंग्स कैंसर में भी कई डॉक्टर इस ट्रीटमेंट का उपयोग कर रहे हैं.

कैंसर रिसर्च यूके के प्रोफेसर चार्ल्स स्वांटन ने पुरस्कार विजेताओं का बधाई दी और कहा, ”इतने अच्छे काम के लिए धन्यवाद, हमारा अपने इम्यून सिस्टम ने कैंसर के प्रतिकूल स्वभाविक शक्ति महसूस की और मरीज़ों के जीवन रक्षक वाले उपचार का इस्तेमाल किया. त्वचा (मेलानोमा), फेफड़े (लंग) और किडनी जैसे एडवांस कैंसर के लिए इन इम्यून बढ़ाने वाली दवाइयों ने कई मरीज़ों का जीवन बदल दिया है.”

“इम्यूनोथेरेपी से एक नया रास्ता निकला है जो अभी अपने शुरुआती दौर में हैं इसलिए भविष्य में इस दिशा में होने वाली प्रगति और नये अवसरों की कल्पना करना ही काफ़ी रोमांचक है.”

सोर्स साभार :-बीबीसी

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क्यूँ शहरों में रहने वाले लोगों को ज्यादा हो रही हड्डियों की ‘खामोश बीमारी’ ..!

राजधानी दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में 9 प्रतिशत लोग हड्डियों की ‘खामोश बीमारी’ के नाम से कुख्यात ऑस्टियोपोरोसिस से और 60 प्रतिशत लोग ओस्टियोपोरोसिस की पूर्व स्थिति ऑस्टियोपेनिया से पीड़ित पाए गए. नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के आथोर्पेडिक विभाग की ओर से आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एसीएफ) के सहयोग से किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) के नवीनतम मार्च (2018) संस्करण में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शहरी इलाके के लोगों में ऑस्टियोपोरोसिस के कारण होने वाले फ्रैक्चर के जोखिम को लेकर देश की राजधानी में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि शहरों में रहने वाले लोगों में ऑस्टियोपोरोसिस की दर अधिक है.

60 प्रतिशत लोग ऑस्टियोपेनिया से पीड़ित
आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एसीएफ) के सहयोग से इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के आथोर्पेडिक विभाग की ओर से 38 से 68 साल के पुरुषों और महिलाओं पर किये इस अध्ययन से पता चला है कि करीब 9 प्रतिशत लोग ऑस्टियोपोरोसिस से और 60 प्रतिशत लोग ऑस्टियोपेनिया से पीड़ित हैं. ऑस्टियोपेनिया और ऑस्टियोपोरोसिस हड्डियों की बीमारी है. ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियां इतनी कमजोर और भंगुर हो जाती हैं कि गिरने से झुकने या छींकने-खांसने पर भी हड्डियों में फ्रैक्च र हो सकता है. ऑस्टियोपोरोसिस के कारण होने वाले फ्रैक्च र सबसे अधिक कुल्हे कलाई या रीढ़ की हड्डी में सबसे ज्यादा होते हैं.

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अस्पताल के लूट से कैसे बचे..!!

कानून जाने

अस्पताल में आपका परिजन भर्ती हो तो कुछ ऐसे क़ानून है जिनकी जानकारी आपको होनी चाहिए वरना आपको अस्पताल में परेशानी का सामना करना पड़ सकताl

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम

स्वास्थ्य सेवा के उपभोक्ता होने के नाते हम देश के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) क़ानून के तहत अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकते हैं. हालांकि हमारे देश में पेशेंट राइट नाम का कोई कानून नहीं है. लेकिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम भी हमारे अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए काफी है.

सूचना का अधिकार

मरीज़ के परिजन के पास दूसरा सबसे बड़ा हथियार होता है सूचना का अधिकार. इस कानून के तहत सबसे पहले हमे डॉक्टर और अस्पताल से ये जानने का अधिकार होता है कि मरीज़ पर किस तरह का उपचार चल रहा है, अस्पताल की जांच में क्या निकल कर सामने आया है, हर टेस्ट की क्या कीमत है, मरीज़ को जो दवाइयां दी जा रही है उनका असर कब और कितना हो रहा है.

अगर मरीज़ ये सब पूछने की स्थिति में नहीं है, तो अस्पताल में साथ रह रहे परिजन इसकी जानकारी अस्पताल प्रशासन से मांग सकते है, और इस जानकारी को हासिल करना हम सबका अधिकार है.

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आजमाए कैसे अजवाइन में है फायेदे ही फायेदे ….!

1. पेट की बीमारियों से छुटकारा 
अजवाइन पेट की कई बीमारियों का रामबाण इलाज है. इसका सेवन करने से पेट दर्द, गैस, उल्‍टी, खट्टी डकार और एसिडिटी में आराम मिलता है. अजवाइन, काला नमक और सूखे अदरक को पीसकर चूरन तैयार कर लें. खाना खाने के बाद इस चूरन का सेवन करने से खट्टी डकार और गैस की समस्‍या दूर हो जाती है. पेट खराब होने पर अजवाइन चबाएं. यही नहीं अगर डाइजेशन सही करना हो तो अजवाइन से बेहतर कुछ नहीं.

2. वजन घटाने में मददगार

अजवाइन वजन घटाने में भी काफी मददगार है. अजवाइन का पानी पीने से शरीर का मेटाबॉलिज्‍म बढ़ता है, जिससे चर्बी घटने लगती है. एक गिलास पानी में रात भर अजवाइन भ‍िगोकर रख दें. इसमें शहद मिलाकर खाली पेट पीने से जल्‍दी फायदा होता है. आप चाहें तो पानी में अजवाइन उबालकर भी पी सकते हैं.

3. सर्दी-जुकाम और खांसी में राहत 
अगर आपकी खांसी ठीक नहीं हो रही है तो अजवाइन का पानी बहुत फायदा करेगा. इसके लिए अजवाइन को पानी में मिलाकर उबाल नें. इसमें काला नमक मिलाकर पीने से आराम म‍िलेगा.  


4. गठिया 
अजवाइन से गठिया के रोग में भी आराम मिलता है. अजवाइन के चूरन की पोटली बनाकर घुटनों में सेंकने से फायदा होता है.आधा कप अजवाइन के रस में सौंठ मिलाकर पीने से भी गठिया का रोग ठीक हो जाता है.
5. दूर करे मसूड़ों की सूजन 
अगर मसूड़ों में सूजन हो तो गुनगुने पानी में अजवाइन के तेल की कुछ बूंदे डालकर कुल्‍ला करने से आराम मिलेगा.  इसके अलावा अजवाइन को भूनकर उसे पीसकर पाउडर बना लें. इससे ब्रश करने से मसूड़ों के दर्द और सूजन में राहत मिलती है. 

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स्मॉग में पहने मास्क और प्यूरीफायर लेकिन रखें जेब का भी ख़याल.!

स्मॉग शुरू होते ही कई ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर एंटी पॉल्यूशन मास्क का प्रचार शुरू होने लगा है.

कई बड़े शहरों की रौनक आज स्मॉग में कहीं छिप सी गई है. जहां एक तरफ हवा में जहर फैला हुआ है, वहीं इससे निपटने के लिए के लिए नए-नए और अनोखे तरीके बताए जा रहे हैं. लेकिन बचने के तरीकों से कहीं ज्यादा लोगों को डराया भी जा रहा है. स्मॉग की आड़ में बिजनेस करने वालों की तादात लागातार बढ़ती ही जा रही है. इसके लिए महंगे एयर प्यूरीफायर से लेकर कई तरह के मास्क मार्केट में आ चुके हैं. आपके लिए इस खतरनाक स्मॉग से बचने के लिए यह जरूरी भी है, लेकिन आपके डर का फायदा उठाकर आपकों मंहगी चीज लेने के लिए कहा जाता है. जबकि जरूरी नहीं है कि आपको इतने मंहगे मास्क या फिर एयर प्यूरीफायर की जरूरत हो.

एंटी पल्यूशन मास्क
स्मॉग शुरू होते ही कई ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर एंटी पॉल्यूशन मास्क का प्रचार शुरू होने लगा है. इसके लिए कई साइट्स की तरफ से भारी डिस्काउंट के साथ ऑफर भी दिए जा रहे हैं. इन मास्क की कीमत 100 रुपये से लेकर 5 हजार रुपये तक है. इसके बाद बताया जा रहा है कि सस्ते मास्क आपकी सेहत के लिए हानिकारक हैं. लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, किसी साधारण मास्क से भी आप डस्ट पार्टिकल से बच सकते हैं. लेकिन मास्क ऐसा लें जो काफी ढीला न हो.
एयर प्यूरिफायर कितना जरूरी
एयर प्यूरीफायर्स के नाम पर भी काफी ज्यादा लोगों की जेब खाली की जा रही है. 5 हजार से लेकर 25 से 30 हजार तक इन्हें बेचा जा रहा है. अपने परिवार की सुरक्षा के लिए लोग इसे खरीद रहे हैं. लेकिन क्या सभी के लिए यह प्यूरीफायर जरूरी है. प्यूरीफायर सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए जरूरी है जिनका घर किसी ऐसे एरिया में है जहां प्रदूषण का लेवल बहुत ज्यादा है या फिर अगर आपके परिवार में किसी को सांस लेने की समस्या है तो भी आप इसे खरीद सकते हैं. लेकिन सभी को इसे लेना बिल्कुल भी अनिवार्य नहीं है.

कब है सुरक्षा की जरूरत
वैसे तो स्मॉग हमेशा ही खतरनाक होता है, जिससे कई तरह की बीमारियों का खतरा बना होता है. लेकिन डॉक्टर कहते हैं कि अगर हवा में कुछ गंध आए या फिर सांस लेने में दिक्कत हो तो यह प्रदूषण का खतरनाक लेवल होता है. जिससे बचना सभी के लिए काफी ज्यादा जरूरी है. ऐसे में बच्चों और बुजुर्गों को मास्क की सुरक्षा मिलना बेहद जरूरी है. एक अच्छा मास्क 100 रुपये तक मिल जाता है, जिसे आप अपने परिवार के लिए खरीद सकते हैं.

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