पीएम के लिए चुनौती है यह रेलवे का प्रोजेक्ट 7 साल में बनी सिर्फ 27 किमी रेल लाइन

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इंदौर। देश के नेता अपने वादों के प्रति कितना गंभीर रहते हैं, ये तो सब जानते हैं। लेकिन हम बात कर रहे हैं एक ऐसे प्रोजेक्ट की, जिसे लेकर रेल विभाग पिछले 7 साल से प्रधानमंत्री तक को अंगूठा दिखा रहा है। सात साल पहले प्रधानमंत्री ने 205 किलोमीटर लंबी जिस रेल लाइन की नींव रखी थी। अब तक रेल विभाग उसके लिए आवश्यक ज़मीन का अधिग्रहण भी नहीं कर पाया है। इस प्रोजेक्ट में अभी तक सिर्फ 27 किलोमीटर की रेल लाइन डल पाई है।

मोदी और महाजन के लिए बनी चुनौती : लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के निर्वाचन क्षेत्र इंदौर को प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात के दाहोद से जोड़ने वाली यह रेल लाइन अब वास्तव में मोदी और महाजन दोनों के लिए चुनौती बन गई है। अब केंद्र में भी भाजपा की सरकार है और दोनों राज्यों में भी भाजपा सत्ता में है और तो और रेलवे लाइन जिन-जिन क्षेत्रों से गुजरनी है, लगभग उन सभी संसदीय क्षेत्रों में भाजपा के ही सांसद हैं।

कब हुई थी घोषणा : 8 फरवरी 2008 को झाबुआ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस परियोजना का भूमिपूजन किया था। समारोह में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के अलावा प्रदेश के कई सांसद भी उपस्थित थे। तब पीएम ने 5 साल में इसका काम पूरा होने की बात कही थी। उस समय इसकी लागत 1238 करोड़ रुपए आंकी गयी थी, जो अब बढ़कर लगभग 3 हज़ार करोड़ हो चुकी है।

क्यों अटका प्रोजेक्ट : राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते ये प्रोजेक्ट शुरू से ही हाशिए पर रहा। रेलवे ने प्रधानमंत्री के हाथों इसका भूमिपूजन तो करा लिया, लेकिन इसे कभी प्राथमिक योजना में शामिल नहीं किया।पैसे की कमी से काम टलता रहा और लागत बढ़ती गई। रेलवे की लापरवाही का आलम यह है कि 205 किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट में 150 किलोमीटर के ट्रैक के लिए तो अभी तक भी ज़मीन का अधिग्रहण नहीं किया गया है।

इस बार सौगात की उम्मीद मगर भरोसा कम : रतलाम के सांसद दिलीप सिंह भूरिया कहते हैं कि ये राजनीति के चलते इस प्रोजेक्ट को अभी तक हाशिए पर रखा गया था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इस बजट में हमको इस प्रोजेक्ट में बड़ी सौगात मिलने की उम्मीद है। लेकिन जानकारों की राय इससे अलग है। नाम ना बताने की शर्त पर रतलाम मंडल के एक आला अधिकारी कहते हैं कि इस बजट में तो इस प्रोजेक्ट को कुछ ख़ास मिलने की उम्मीद नहीं है, लेकिन आगे कुछ ज़रूर हो सकता है। उनके मुताबिक़ यदि केंद्र और दोनों राज्यों की सरकारें पूरी इच्छाशक्ति के साथ मिलकर काम करें तो भी इंदौर से दाहोद तक रेल चलने में कम से कम 5 साल और लग सकते हैं वो भी तब जब केंद्र इसे प्राथमिक योजना में शामिल करें।

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