इस खदान से हर साल निकलते थे 2,000kg हीरे

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फोटो में दिख रहा ये साइबेरियाई क्रेटर नहीं, बल्कि रूस के पूर्वी साइबेरिया स्थित मिर्नी की पूर्व ‘मिर’ हीरा खदान है। 2011 में सुरक्षा कारणों के चलते इसे स्थाई रूप से बंद कर दिया गया। तब इसकी गहराई 525 मीटर और चौड़ाई 1,200 मीटर थी। बिंघम कैनियन खदान के बाद ‘मिर’ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खुदा हुआ गड्ढा था।
रिपोर्ट के मुताबिक, खदान के ऊपर से होकर गुजरने वाले कई हेलिकॉप्टर हादसे का शिकार हो गए। इस कारण खदान बंद करवा दी गई। एक्सपर्ट का तर्क था कि गड्ढा इतना भीमकाय था कि अंदर की ओर बहने वाली हवा ऊपर से होकर गुजरने वाले हेलिकॉप्टरों को खींच लेती थी, जिससे हादसे होते थे। 13 जून 1955 में सोवियत भूवैज्ञानिक यूरी खैबरदिन ने इस खदान की खोज की थी। रूस में ऐसे खदान की खोज पहली मर्तबा हुई थी। इसके लिए 1957 में यूरी को लेनिन पुरस्कार से नवाजा गया, जो सोवियत संघ का सर्वोच्च पुरस्कार में से था।
खदान की शुरुआत 1957 में गलन भरी ठंडे मौसम में हुई थी। हालांकि, साइबेरिया में साल के सात महीने मौसम काफी सर्द रहता है। ऐसे में इस मौसम में जमीन सख्त हो जाती है। कर्मचारियों के लिए खुदाई कार्य लोहे के चने चबाने सरीखा होता था। कर्मचारी जेट इंजन की मदद से हीरा निकालने के लिए खुदाई करते थे। कभी-कभी डायनामाइट का भी इस्तेमाल किया जाता था। इस खदान से 44 साल तक हीरा निकाला गया। खदान का काम जब अपने चरम पर था, तब यहां से हर साल एक करोड़ कैरेट (2,000 किलो) हीरा निकाला जाता था। खदान से कुल 3,600 लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी थी।
ठंड में ये होती थी परेशानी
खदान जिस इलाके में स्थित था, वहां का मौसम इतना सर्द होता था कि कर्मचारी जिन वाहनों के जरिए पहुंचते थे, उसका पेट्रोल तक जम जाता था। वहीं, खदान में मौजूद मशीनरी बर्फ में न जम जाए, इसलिए पूरे गड्ढे को रात भर ढककर रखा जाता था।

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