लाजवाब लहरिया! राजपूतों से लेकर रैंप्स तक

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लहरिया राजस्थान की एक पारंपरिक टाई-एंड-डाई तक्नीक है. इसे 17वीं शताब्दी में इजाद किया गया था और इसका इस्तेमाल राजपूताना राजाओं की पगड़ी पर किया जाता था. 19वीं शताब्दी के अंत तक इसका इस्तेमाल राजस्थान के कई हिस्सों, जैसे की जयपुर, कोटा, अजमेर और अलवर में भी होने लगा. धीरे-धीरे कई बिज़नेस फैमिलीज़ इसका हिस्सा बन गईं. आज ये इंडियनवेयर में इस्तेमाल होने वाली आम तकनीक है, खासकर साड़ियों और दुपट्टों में और कई फैशन डिज़ाइनर्स ने भी इन्हें रैंप पर शोकेस किया है.
कैसे बनाया जाता है लहरिया?
लहरिया के काम में बहुत समय लगता है जिसके बाद पको मिलते हैं ब्राइट कलर के कपड़े अलग-अलग पैटर्न्स में. ‘लहरिया’ शब्द लहर से लिया गया है. इस तकनीक से बनाई गई लहरदार टेढ़ी स्ट्राइप्स ब्राइट कलर कॉम्बिनेशंस में बेहद शानदार लगता है. ये टेढ़ी स्ट्राइप्स ओरिजिनली कई रंगों मे रंगे जाते हैं जिससे की कई शानदार पैटर्न्स बनते हैं.

हर लहरिया साड़ी को बनाने में काफी मेहनत लगती है. इसमें ज़्यादातर लाइटवेट फैब्रिक्स का इस्तेमाल होता है जैसे कि कॉटन, सिल्क, शिफॉन या जॉर्जेट, क्योंकि ये आसानी से रंग सोख लेते हैं. इस पैटर्न को पाने के लिए कपड़े को ऐंठकर नायलॉन के धागे से बांधा जाता है और फिर रंगों में डुबोया जाता है. कपड़े को पगड़ी या साड़ी की तरह बांधा जाता है जिससे की उसपर लहरदार पैटर्न बन जाए. पारंपरिक तौर पर कारीगर कपड़े को बंधकर 5 अलग-अलग रंगों में डुबोते थे. आजकल, लाख, अनार, मेहंदी, नील और टेसू के फूलों से बने रंगों के इस्तेमाल होता है.

बदलते ट्रेंड्स के साथ, लहरिया सिर्फ स्ट्राइप्स नहीं रह गए हैं. अब कारीगर की क्रिएटिविटी और इमैजिनेशन के मुताबिक प्रिंट्स और पैटर्न्स बनते हैं. एक और तरह की रंगने की टकनीक है ‘मोथरा’ जिसमें एक चेकर्ड पैटर्न बनता है जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर खाली जगह छूट जाती है. ये खाली जगह एक अनाज के दाने के बराबर होती है, जिससे इस तकनीक का नाम मोथरा पड़ा.
कन्टेम्पररी फैशन में लहरिया
दिल्ली-बेस्ड डिज़ाइनर Anupama Dayal, जो इंडियन हैंडिक्राफ्ट्स और फ्लोई silhouettes के इस्तेमाल के लिए जानी जाती हैं, ने अपने 2010 के रिज़ॉर्ट कलेक्शन में लहरिया के साथ एक्सपेरिमेंट किया था. बीचवेयर डिज़ायनर Malini Ramani ने भी लहरिया के साथ काम किया है. अपने कन्टेम्पररी silhouettes और ग्लोबल इन्फ्यूज़न्स के लिए जाने जाने वाले मुंबई-बेस्ड डिज़ाइनर Nachiket Barve ने भी इस तकनीक के साथ एक्सपेरिमेंट किया है. जानी-मानी ब्राइडलवेयर डिज़ाइनर Anita Dongre ने भी अपेन पिछले कलेकशन्स में लहरिया का इस्तेमाल किया है.

अफसोस कि समय के साथ लहरिया अपनी पहचान खो रहा है. India Artisans and Craft Workers Welfare Association, Dastkar, SACH – South Asian Composite Heritage और Craft Council of India जैसी संस्थाएं इस तकनीक को बचाने की ज़ोरो-शोरों से कोशिश कर रहे हैं.

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