कपड़ों पर खिलती फूलों की खूबसूरती

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इंडियन कल्चर में पंजाब का योगदान शानदार संगीत, लाजवाब खाने और खूबसूरत रंगों से कहीं ज़्यादा है. पटियाला सलवार सूट और फुलकारी एम्ब्रॉएडरी के बिना इंडियन फैशन बेहद नीरस होता. इस कढ़ाई का जन्म प्राचीन भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ था जिसमें बेहद कुशल कारीगरी की ज़रूरत होती है. पारंपरिक कारीगरों ने खूबसूरत फूलों के मोटिफ्स से इस कला को परफेक्ट बना लिया. शुरुआती दौर में फुलकारी हर तरह के कपड़ों पर की जाती थी लेकिन बाद में ये सिर्फ स्कार्व्स और शॉल्स तक ही सीमित हो गई और कभी-कभी शूज़, बेल्ट्स और बैग्स जैसी ऐक्सेसरीज़ पर भी.
फुलकारी की शुरुआत कब हुई?
फुलकारी एक तरह की फूलों वाली कढ़ाई है जो कपड़ों पर की जाती है. इसको ये नाम भी फूल शब्द से ही मिला है. फुलकारी की शुरुआत 15वीं सदी में हीर-रांझा की दुखभरी प्रेम कहानी से हुई थी. ऐसा माना जाता है कि हीर के पास काफी कपड़े थे जिसमें फुलकारी गार्मेंट्स भी थे, जो उसे उसकी शादी पर तोहफे में दिए गए थे. कई लोगों का मानना है कि ये कला पर्शीया से आई है, जहां इसे गुलकारी कहा जाता है, जिसका मतलब भी लगभग यही होता है (गुल मतलब फूल और कारी मतलब काम).
इसे कैसे बनाया जाता है?
पारंपरिक तौर पर इसे मोटे कॉटन फैब्रिक पर बनाया जाता था जिसे खद्दर कहते हैं. आमतौर पर चार रंग के खद्दर का इस्तेमाल किया जाता था और हर रंग का अपना अलग मतलब होता था – सफेद बूढ़ी या विधवा औरतों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था, लाल छोटी लड़कियों और होने वाली दुल्हनों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था, नीले और काले रंग रोज़मर्रा के इस्तेमाल के लिए होता था. उसके बाद पूरे खद्दर के कपड़े पर खूबसूरत फ्लोरल पैटर्न बनाए जाते थे. फुलकारी मूल रूप से दो तरह से की जाती है. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में कढ़ाई पूरी होने के बाद खद्दर को सिला जाता है जिससे की लोगों को थोड़ी डिस्टॉर्टेड डिज़ाइन देखने को मिले वहीं पूर्वी पंजाब में खद्दर को कढ़ाई से पहले ही सिल लिया जाता है. कुछ फ्लोरल पैटर्न्स लोगों के क्लास को डिफाइन करते थे. जैसे की क्लस्टर स्टिच से बनाए गए फूल वर्किंग क्लासेज़ की औरतों द्वारा पहने जाते थे, वहीं डार्निंग स्टिच से बने गए फूल सोसायटी की अपर क्लास की औरतों द्वारा पहने जाते थे.

फुलकारी कितने तरह की होती है?
फुलकारी की खासियत इसकी वर्सटैलिटी. मूल रूप से चार तरह की फुलकारी होती है.

बाघ- इस तरह की फुलकारी बहुत घनी होती है और फैब्रिक के बेस को फ्लोरल पैटर्न्स से कवर किया जाता है.

थिरमा – इस तरह की फुलकारी शुद्धता का प्रतीक होती है, इसके व्हाइट बेस फैब्रिक की वजह से. ये अकसर उम्रदराज औरतों और विधवाओं द्वारा पहनी जाती है.

दर्शन द्वार – इस तरह की फुलकारी गुरुद्वारों में चढ़ाई जाती है. इसमें सिर्फ फूलों के पैटर्न नहीं होते हैं बल्कि इन्सानों और जानवरों के भी पैटर्न होते हैं.

बावन फुलकारी – बावन यानि की 52. इस तरह की फुलकारी में एक पीस पर 52 अलग-अलग तरह के पैटर्न बनाए जाते हैं.
कन्टेम्पररी फैशन में फुलकारी
इंडियन डिज़ाइनर्स समय-समय पर फुलकारी के साथ एक्सपेरिमेंट करते रहे हैं. इंडिया के नंबर एक डिज़ाइनर Manish Malhotra ने पेश किया था फुलकारी से इंस्पार्ड एक पूरा कलेक्शन. हमें नेट फैब्रिक पर खूबसूरत फ्लोरल एम्ब्रॉएडरी के हिंट्स बेहद पसंद आए. एक और डिज़ाइनर जिन्होंने फुलकारी के साथ काम किया है, वो हैं Anita Dongre. Tarun Tahiliani और JJ Valaya जैसे couturiers ने भी अपने शानदार ब्राइडल वेयर में फुलकारी के साथ एक्सपेरिमेंट किया है

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