छाया कबीर के भजनो का जादू

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kabir

चार दिनी मालवा कबीर यात्रा का जत्था सोमवार को जब शहर पहुंचा तो उसकी अगवानी भी जोरदार ढ़ंग से हुई। यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में सद्गुरू कबीर स्मारक सेवा शोध संस्थान द्वारा 20 वर्षों से आयोजित होते आ रहे मालवा कबीर यात्रा 2016 का अंतिम पड़ाव अपने तमाम रंग लिए चढ़ा।

गुनगुनाते लब, थिरकते कदम, ताल मिलाते हाथ, चेहरे पर उल्लास का भाव और शांति का अनुभव करता हृदय। आध्यात्मिक सुकून ऐसा मानों मुद्दत की प्यास को संतृप्त करने के लिए शीतल गंगाजल मिल गया हो। कभी आंखें बंद कर किसी धुन में खो जाने का भाव जाग्रत होता तो कभी थिरकते कदमों को रोक पाना भी मुश्किल हो जाता। यह अनुभव किसी एक ‘मस्ताने संत’ का नहीं बल्कि संतों की वाणी से मस्ताने हुए आम और खास का रहा।
कार्यक्रम का असली रंग तो बंगाल से आए लक्ष्मणदास के बाउल संगीत से जमा जिसमें लोक संस्कृति की बात नहीं बल्कि सुखी संसार का सार समाहित था।
मुंबई से आए नीरज आर्या का कबीर कैफे इस बात का प्रमाण था कि युवाओं को उम्दा संगीत और विचार दिए जाएं तो वे भी उसे स्वीकारते हैं। वायलिन, गिटार, बेस गिटार जैसे इंस्ट्रूमेंट्स पर चार युवाओं के इस ग्रुप ने जब सद्गुरु के आंगन में आने की महिमा और खुशी को सुनाया तो श्रोता खुद को रोक नहीं पाए। बच्चों से लेकर बुजुर्ग यहां तक कि गायक कैलाश खेर की पत्नी शितल खेर ने भी कई बार डांस किया।

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