म्यूरल गुरु भरत रावल इंदौर आए

bharat rawal

इंदौर. प्रकृति ही मेरी पे्ररणा है और प्रकृति मं ही मैं रूपाकार ढूंढता हूं। ये बात पुणे से आए म्यूरल गुरु भरत अग्रवाल ने कही। वे क्राफ्ट एंड कल्चर आर्ट गैलरी में बुधवार से शुरू हो रही म्यूरल वर्कशॉप के लिए इंदौर आए हैं। देश भर में थ्रीडी म्यूरल आर्ट को लोकप्रिय बनाने वाले भरत अग्रवाल ने पत्रिका से चर्चा करते हुए बताया कि 1980 में मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से फाइन आर्ट ग्रेजुएशन और स्कल्पचर में स्पेशलाइजेशन करने के बाद 1985 में उन्होंने खुद ही थ्रीडी म्यूरल आर्ट को डेवलप करना शुरू किया। अब वे देशभर में म्यूरल वर्कशॉप्स के जरिये ये कला सिखाते हैं।
भरत रावल ने कहा कि इंटीरीयर और एक्सटीरियर डिजाइनिंग में घरों से लेकर होटल, हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी से लेकर एयरपोर्ट तक में म्यूरल्स से सजावट की जा रही है। अब तो ये कंसेप्ट आ रहा है कि शहर में कोई दीवार खाली न रहे इसलिए ओवर ब्रिज की दीवारों पर भी म्यूरल बनावाए जा रहे हैं इसलिए युवाओं के लिए इसमें काफी स्कोप है।
भरत रावल कहते हैं कि म्यूरल का अर्थ होता है दीवार पर बने चित्र लेकिन जब उस कला को त्रिआयामी विस्तार दिया जाता है तो थ्रीडी म्यूरल बनते हैं। म्यूरल में चित्रकला और शिल्प के साथ कई और कलाओं का संगम भी होता है। वे म्यूरल का मूल आकार रेजिन क्ले से बनाते हैं लेकिन इसमें मीडियम का कोई बंधन नहीं होता। इसमें पेंटिंग और रंग तो शामिल होते ही हैं साथ ही इसमें लकड़ी और पत्थर और धातु पर नक्काशी भी होती है।

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