फिल्म रिव्यु – :”लाल रंग”

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सय्यद अहमद अफजाल की ‘लाल रंग’ को नजरअंदाज या दरकिनार नहीं कर सकते। हिंदी की यह ठेठ फिल्म है, जिसमें एक अंचल अपनी भाषा, रंग और किरदारों के साथ मौजूद है। फिल्म का विषय नया और मौजूं है। पर्दे पर दिख रहे नए चेहरे हैं। और साथ ही पर्दे के पीछे से भी नई प्रतिभाओं का योगदान है। यह फिल्म अनगढ़, अधपकी और थोड़ी कच्ची है। यही इसकी खूबी और सीमा है, जो अंतिम प्रभाव में कसर छोड़ जाती है।
सय्यद अहमद अफजाल ने एक साथ कई भावों और विषयों को फिल्म में बुना है। इसकी वजह से फिल्म कहीं थोड़ी बिखरी तो कहीं थोड़ी ठहरी महसूस होती है। ‘लाल रंग’ के धंधे के विस्तार और गहराई में कहानी नहीं उतरती। खून का कारोबार पृष्ठभूमि में चला जाता है। फिर रिश्तों, दोस्ती और त्याग की कहानी चलने लगती है। रणदीप हुडा को अक्षय ओबेराय से बराबर का सहयोग नहीं मिलता। वे कमजोर पड़ते हैं। नतीजे में दोनों के साथ के दृश्‍य भी कमजोर हो जाते हैं। कलाकारों की सही संगत न हो तो परफॉर्मेंस की जुबलबंदी नहीं हो पाती।
इस फिल्म के संगीत में माटी के सुर और शब्द हैं। गीतकारों, गायकों और संगीतकारों ने हरियाणा के संगीत की खूबियों से फिल्म को सजाया है। फिल्म का छायांकन खूबसूरत है। आकाश से देखने पर करनाल भी व्यवस्थित और सुंदर नजर आता है।
फिल्म के कई संवादों में हरियाणवी समझने में दिक्कत होती है। प्रवाह में भाव तो समझ में आता है। अर्थ भी मालूम होता तो प्रभाव बढ़ जाता।

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