फिल्म रिव्यु :- फोबिया

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हॉरर फिल्मों में संगीत की खास भूमिका होती है। पवन कृपलानी ने ‘फोबिया’ में संगीत का सटीक इस्तेमाल किया है|
हालांकि उन्हें राधिका आप्टे जैसी समर्थ अभिनेत्री का सहयोग मिला है, लेकिन उनकी तकनीकी टीम को भी उचित श्रेय मिलना चाहिए। म्यूजिक डायरेक्टर डेनियल बी जार्ज, एडिटर पूजा लाढा सूरती और सिनेमैटोग्राफर जयकृष्णन गुम्मडी के सहयोग से पवन कृपलानी ने रोमांचक तरीके से डर की यह कहानी रची है।
पवन कृपलानी ने बहुत खूबसूरती से घटनाओं को गुंथा है। ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं, जब लगता है कि भेद खुल जाएगा, लेकिन कहानी वहां से आगे बढ़ जाती है। फिल्म का रोमांच बना रहता है। यह फिल्म मुख्य रूप से राधिका आप्टे पर निर्भर करती है। शान के किरदार में सत्य दीप मिश्रा की सहयोगी भूमिका है। दोनों ने मिलकर पवन कृपलानी की सोच-समझ को उम्दा तरीके से प्रस्तुत किया है।
राधिका आप्टे अपनी पीढ़ी की टैलेंटेड अभिनेत्री हैं। अपनी फिल्मों और भूमिकाओं में भिन्नता रखते हुए वह आगे बढ़ रही हैं। ‘फोबिया’ में हम उनके सामर्थ्य से फिर से परिचित होते हैं। मुश्किल दृश्यों में उनकी पकड़ नहीं छूटती है और चालू दृश्यों में वह हल्की नहीं पड़ती हैं। उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं और होंठ बोलते हैं। ऐगोराफोबिया मनोरोग की शिकार महक को राधिका आप्टे ने पूरे डर के साथ चित्रित किया है।
सत्यदीप मिश्रा की सहयोगी भूमिका है। वे अपने स्पेस का सदुपयोग करते हैं। पड़ोसियों के रूप में यशस्विनी दायम और अंकुर विकल भी अपनी मौजूदगी से कुछ न कुछ जोड़ते हैं। खूबसूरत बात है कि इस हॉरर फिल्म में विकृत चेहरे और अकल्पनीय दृश्य नहीं है। और न ही तंत्र-मंत्र का इस्तेमाल दिखाया गया है। इसे हॉरर से अधिक सायकोलोजिकल थ्रिलर कहना उचित होगा।

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