“मैं अपनी ज़िंदगी के अंतिम 10 साल ख़ुद के लिए जीना चाहता हूं” गोवा के सीएम ख्वाहिश रह गयी

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पर्रिकर केंद्रीय रक्षा मंत्री के पद से मार्च 2017 में इस्तीफ़ा दे चौथी बार गोवा के मुख्यमंत्री बनकर अपने गृह राज्य लौट गए थे.

हालांकि अभी इस बात पर अटकलें लग रही हैं कि उनके बाद राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा लेकिन पर्रिकर ने पहले ही घोषित कर दिया था कि ये उनका अंतिम कार्यकाल है और आगे से चुनाव नहीं लड़ेंगे.

उन्होंने एक टीवी चैनल से एक बार कहा था, “मैं अपनी ज़िंदगी के अंतिम 10 साल ख़ुद के लिए जीना चाहता हूं. मैंने राज्य को काफ़ी कुछ वापस दिया है. मैं इस कार्यकाल के बाद मैं चुनाव लड़ने या चुनाव का हिस्सा नहीं बनूंगा, चाहे पार्टी की ओर से कितना ही दबाव आए.”

लेकिन पर्रिकर की ये ख़्वाहिश अधूरी ही रह गई और शाम पांच बजे उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. केंद्र सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है.

हालांकि राज्य की राजनीति से वो दो साल अलग रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर वो केंद्र में रक्षा मंत्री बनना स्वीकार किया था.

मापुसा में गौर सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे पर्रिकर शुरुआती जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए थे.

उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से मैटलर्जी में डिग्री हासिल की और गोवा में ही उन्होंने न्यूमेटिक पंप बनाने वाली फैक्ट्री खोली.

1980 के दशक में जब बीजेपी गोवा को लेकर गंभीर हुई तो उसने संघ से कुछ कैडर मांगे. संघ ने पर्रिकर और लक्ष्मीकांत पारसेकर को बीजेपी में भेजा.

1961 में पुर्तगालियों से आज़ाद होने के बाद से ही गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का शासन था, जिसका वहां की पिछड़ी जातियों में काफ़ी मज़बूत जनाधार था.

लक्ष्मीकांत पारसेकर का परिवार भी एमजीपी का कट्टर समर्थक था, लेकिन पारसेकर ने अलग रास्ता चुना.

1989 में बीजेपी चुनाव में गई तो उसे एक प्रतिशत से भी कम वोट मिले.

लेकिन राजनीतिक सूझबूझ और सांगठनिक कौशल के बूते एक दशक में ही पर्रिकर ने पार्टी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई.

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