‘अंडमान निकोबार’हज़ार द्वीपों का द्वीपसमूह

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प्राचीन भारतीय मान्यता यह थी कि देश से दूर समुद्र पार करते हुए कोई भी व्यक्ति ‘पवित्र गंगा’ से अलग होने के कारण अपनी जाति से वंचित हो जाएगा और समाज से कट जाएगा. ‘काला पानी’ उपमहाद्वीप में आम तौर पर दूर-दराज़ की जगह के लिए बोला जाता है. मुहावरे में लंबी दूरी के लिए ‘काले कोस’ जैसे शब्द अर्सें से प्रचलित हैं. राजनीतिक अर्थों में काला पानी से तात्पर्य हिंद महासागर में वो द्वीप है,जहां अंग्रेज़ शासक क़ैदियों को देशनिकाला देते थे.

इतिहासकार और शोधकर्ता वसीम अहमद सईद अपने शोध ‘काला पानीः 1857 के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी’ में लिखते हैं, ”अंग्रेज़ों ने यहां अपना परचम लहराने के अलावा क़ैदियों की बस्ती और उपनिवेश बनाने के लिए सन 1789 में पहली कोशिश की जो विफल हो गयी. बाद में सन 1857 का हंगामा बरपा तो फांसियों, गोलियों और तोप से क्रांतिकारियों की जानें ली गयीं. ” ” उम्र कै़द भी दी गयी मगर किसी दूर-दराज़ जगह पर सज़ा देने की बस्ती या क़ैदियों की कॉलोनी की ज़रूरत महसूस की गयी ताकि अंग्रेज़ों से ‘बाग़ी’ हुए लोग फिर से बग़ावत या विरोध न कर सकें. उनकी निगाह अंडमान द्वीप समूह पर ही गयी.” ये द्वीप कीचड़ से भरे थे. यहां मच्छर, ख़तरनाक सांप, बिच्छुओं और जोंकों और अनगिनत प्रकार के ज़हरीले कीड़ों की भरमार थी.

1858 में पहुंचा था पहला जत्था

फ़ौजी डॉक्टर और आगरा जेल के वार्डन जे. पी. वॉकर और जेलर डेविड बेरी की निगरानी में ‘बाग़ियों’ को लेकर पहला जत्था 10 मार्च सन 1858 को एक छोटे युद्ध पोत में वहां पहुंचा.

खरल के साथी संभावित तौर पर उसी जहाज़ में ले जाए गये होंगे. फिर कराची से और 733 क़ैदी लाए गए और फिर यह सिलसिला जारी रहा.

सईद लिखते हैं ”काला पानी एक ऐसा क़ैदख़ाना था जिसके दर-ओ-दीवार का भी वजूद न था. अगर चारदीवारी या चौहद्दी की बात कीजिए तो समुद्री किनारा था और परिसर की बात कीजिए तो उफान मारता हुआ अदम्य समुद्र ही था.

क़ैदी क़ैद होने के बावजूद आज़ाद थे लेकिन फरार होने के सारे रास्ते बंद थे और हवाएं जहरीली थीं.

”जब क़ैदियों का पहला जत्था वहां पहुंचा तो स्वागत के लिए सिर्फ़ पथरीली और बेजान ज़मीन, घने और गगनचुंबी पेड़ों वाले ऐसे जंगल थे, जिनसे सूरज की किरणें छन कर भी धरती के गले नहीं लग सकती थीं. खुला नीला आसमन, प्रतिकूल और विषैली जलवायु, गंभीर जल संकट और शत्रुतापूर्ण जनजातियां.”

दिल्ली के इस शोधकर्ता के अनुसार अंडमान ही को भारत की आज़ादी की जंग की क़ुर्बानगाह क़रार दिया जाना चाहिए.

फिरंगियों, उनके पदाधिकारी, कर्मचारी और अमले के दूसरे लोगों के लिए तो तंबू गाड़ दिये गये लेकिन क़ैदियों को झुग्गी, झोंपड़ियां और अस्तबल जैसी जगह भी बहुत बाद नसीब हो सकी. वहां न कोई फ़र्श था, न रहने के लिए बुनियादी ज़रूरतों का कोई सामान.

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